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Friday, 26 May 2017

तुम्हारा स्पर्श


मेरे आँगन से बहुत दूर
पर्वतों के पीछे छुपे रहते थे
नेह के भरे भरे बादल
तुम्हारे स्नेहिल स्पर्श पाकर
मन की बंजर प्यासी भूमि पर
बरसने लगे है बूँद बूँद
रिमझिम फुहार बनकर
अंकुरित हो रहे है
बरसों से सूखे उपेक्षित पड़े
इच्छाओं के कोमल बीज
तुम्हारे मौन स्पर्श की
मुस्कुराहट से
खिलने लगी पत्रहीन
निर्विकार ,भावहीन
दग्ध वृक्षों के शाखाओं पे
 गुलमोहर के रक्तिम पुष्प
भरने लगे है रिक्त आँचल
इन्द्रधनुषी रंगों के फूलों से
तुम्हारे शब्दों के स्पर्श
तन में छाने लगे है बनकर
चम्पा की भीनी सुगंध
लिपटने लगे है शब्द तुम्हारे
महकती जूही की लताओं सी
तुम्हारे एहसास के स्पर्श से
मुदित हृदय के सोये भाव
कसमसाने लगे है आकुल हो
गुनगुनाने लगे है गीत तुम्हारे
बर्फ से जमे प्रण मन के
तुम्हारे तपिश के स्पर्श में
गलने लगे है कतरा कतरा
हिय बहने को आतुर है
प्रेम की सरिता में अविरल
देह से परे मन के मौन की
स्वप्निल कल्पनाओं में
       
        #श्वेता🍁

समेटे कैसे

सुर्ख गुलाब की खुशबू,हथेलियों में समेटे कैसे
झर रही है ख्वाहिशे संदीली,दामन में समेटे कैसे

गुज़र जाते हो ज़ेहन की गली से बन ख्याल आवारा
एहसास के उन लम्हों को, रोक ले वक्त समेटे कैसे

रातों को ख्वाब के मयखाने में मिलते हो तुम अक्सर
भोर की पलकों से फिसलती, खुमारी को समेटे कैसे

काँटें लफ्ज़ों के चुभ जाते है आईना ए हकीकत में
टूटे दिल के टुकड़ों का दर्द,झूठी मुस्कां में समेटे कैसे

तेरे बिन पतझड़ है दिल का हर एक मौसम सुन लो
तेरे आहट की बहारों को,उलझी साँसों में समेटे कैसे
          #श्वेता🍁