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Tuesday, 13 June 2017

भँवर

स्याह रात की नीरवता सी
शांत झील मन में
तेरे ख्यालों के कंकर
हलचल मचाते है
एक एक कर गिरते
जल को तरंगित करते
लहरें धीरे धीरे तेज होती
किनारों को छूती है
भँवर बेचैनी की तड़प बन
खींचने लगते है
बेबस बेकाबू मन सम्मोहित
अनन्त में उतर जाता है
निचोड़कर प्राण  फिर
छोड़ देता है सतह पर
निर्जीव देह जिसे सुध न रहती
बहता जाता है मानो
जीवन के प्रवाह में अंत की तलाश में

#श्वेता🍁




तुम्हारे लिए

जेहन के आसमान पर
दिन भर उड़ती रहती
ढूँढ़ती रहती कुछ पल का सुकून
बेचैन ,अवश ,तेरी यादों की तितलियाँ
बादलों को देख मचल उठती
संग मनचली हवाओं के
छूकर तुम्हें आने के लिए
एक झलक तेरी
अपनी मुसकुराहटों मे
बसाने के लिए,
टकटकी लगाये चाँद को
देखती तुम्हारी आँखों में
चाँदनी बन समाने के लिए,
अपनी छवि तुम्हारे उनींदी पलकों में
छिपकर देखने को आतुर
तुम्हारे ख्यालों के गलियारे में
ख्वाब में तुमसे बतियाने के लिए,
तुम्हारे लरजते जज़्बात में खुद
को महसूस करने की चाहत लिए
तुम्हारे तन्हाई में कसमसाती
कविताओं के सुगंधित
उपवन मे विचरती
शब्दों में खुद को ढ़ूँढ़ती
तितलियाँ उड़ती रहती है
व्याकुल होकर
प्रेम पराग की आस में
बस तुम्हारे ही ख्यालों के
मनमोहक फूल पर।


      #श्वेता🍁