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Friday, 21 July 2017

आहटें

दिन के माथे पर बिखर गयी साँझ की लटें
स्याह आसमां के चेहरे से नज़रे ही न हटें

रात के परों पे उड़ती तितलियाँ जुगनू की
अलसाता चाँद बादलों में लेने लगा करवटें

फिसलती चाँदनी हँसी फूलों के आँचल पर
निकले टोलियों में सितारों की लगी जमघटें

पूछ रही हवाएँ छूकर पत्तों के रूखसारों को
क्यों खामोश हो लबों पे कैसी है सिलवटें

सोये झील के आँगन में लगा है दर्पण कोई
देख के मुखड़ा आसमां सँवारे बादल की लटें

चुपके से हटाकर ख्वाबों के अन्धेरे परदे
सुगबुगाने लगी नीदें गुनगुनाने लगी आहटे

    #श्वेता🍁

हे, अतिथि तुम कब जाओगे??

जलती धरा पर छनकती
पानी की बूँदें बुदबुदाने लगी,
आस से ताकती घनविहीन
आसमां को ,
पनीली पीली आँखें
अब हरी हो जाने लगी ,
बरखा से पहले उमस ,तपन
से बेहाल कण कण में
बारिश की कल्पना भर से ही
घुलने लगती थी सूखी जीभ पर
चम्मच भर शहद सी
स्वागत गीत गाते उल्लासित हृदय
दो चार दिन में सोंधी खुशबू
माटी की सूरत बदल गयी,
भुरभुरी होकर धँसती
फिसलन भरे किचकिच रास्तों में,
डबडबाने लगी है सीमेंट की दीवारें
पसीजने को आतुर है पत्थरीले छत,
खुद को बचाता घर अचानक
उफनते नदी के मुहाने पर आ गया हो
दरारों से भीतर आती
छलनी छतों से टपकती बूँदों को
कटोरे ,डेगची मगों में
भरने का असफल प्रयास करते
एक कोने में सिमटे
बुझे चूल्हे में भरते पानी को देखते
कल की चिंता से अधमरे
सोच रहे है चिंतित,
बरखा रानी और कितना सताओगी
त्रस्त दुखित हृदय पूछते है
हे, अतिथि तुम कब जाओगे??

     #श्वेता🍁