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Tuesday, 31 March 2026

युद्ध और चिड़िया


 अबके फागुन 
टेसू नहीं खिले
बेरंग, उदास जंगलों 
में पत्तों के बिछावन
संगीनों की नोंक से रक्तरंजित 
मासूमों के दर्द सहला रहे हैं...।
पतझड़ में टूटे 
ज़िंदगी की शाखाओं से
वसंत आने के बाद 
नये पत्ते फिर से मुस्काऍंगे
पर सैनिकों की कराहों 
से बेचैन, डरी, अन्यमनस्क 
बारूद की गंध से छटपटाती
तितलियों,फूलों, गौरेया के 
हृदय में वसंत रंग नहीं भर पाते हैं...
हवाओं में बढ़ती नफरत की
मात्राओं को सोखने में असमर्थ 
घबराई चिड़िया नहीं जानती
युद्ध किसलिए है...
शत्रु और मित्र की परिभाषाओं से अनभिज्ञ,
सही-गलत की सीमाओं से परे,
मृत सैनिकों की ऑंखों से
कुछ सपने चुनकर 
उनके घर-आंगन में बो रही हैं
ताकि युद्ध खत्म  होने के बाद
बंजर हुई धरती की दुर्दशा पर
रोते चातक की ऑंसुओं की नमी से
जब फूटेंगे 
कुछ रंग और ख़ुशबू से भरे
 हरे-भरे पेड़
उनकी डालियों में वो
फुदक-फुदक कर गा सकेगी
फिर से प्रेम और करुणा से भरी 
जीवन की पवित्र प्रार्थनाऍं...। 


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-श्वेता
३१ मार्च२०२६
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11 comments:

  1. आपकी भावनाओं को अनुभव कर सकता हूँ श्वेता जी। प्रत्येक संवेदनशील मन की यही अनुभूति होगी।

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  2. पता नहीं कितने फागुन ?

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  3. संवेदनशील हृदय की चिंतन परक अभिव्यक्ति श्वेता जी ! सस्नेह…,

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  4. प्रेम और करुणा से भरी
    जीवन की पवित्र प्रार्थनाऍं...। अत्यंत मार्मिक सृजन!!

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  5. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में गुरुवार 02 एप्रिल, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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  6. बहुत सुंदर भावपूर्ण अभिव्यक्ति

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  7. घबराई चिड़िया नहीं जानती
    युद्ध किसलिए है..
    - आज तो पूरी दुनिया नहीं जान पा रही कि युद्ध किसलिए है..
    बेह्तरीन

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  8. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर रविवार 5 अप्रैल 2026 को लिंक की गयी है....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

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  9. हार जीत देश और देश के आकाओं के नाम...सैनिकों के आँखों के सपने काश कोई चिड़िया ला सके कहीं आँगन में... बहुत ही हृदयस्पर्शी सामयिक रचना .

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  10. यार, यह कविता पढ़कर दिल भारी हो जाता है। आपने युद्ध की सच्चाई को बहुत सादगी से लेकिन गहराई के साथ सामने रखा है। मुझे इसमें प्रकृति और इंसान के दर्द का जो जुड़ाव दिखा, वो सच में झकझोर देता है। तितलियाँ, चिड़िया और फूलों के जरिए तुमने मासूमियत की आवाज़ उठाई है।

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आपकी लिखी प्रतिक्रियाएँ मेरी लेखनी की ऊर्जा है।
शुक्रिया।