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Thursday, 14 May 2026

पापा चले गये...



अनुभव

पिछले छः दिनों से ऐसा लग रहा है कि मैं किसी मरघट 

के प्रतीक्षालय में बैठी हूॅं। तीव्र होती मृत्यु की गंध धीरे-धीरे मन पर एक संवेदनहीनता की परत चढ़ा रही है। 

 

अपने पापा की सबसे दुलारी, कोमल हृदय बेटी आज अस्पताल के CCU के बाहर प्रतीक्षा कक्ष में बैठी उनकी 

अंतिम सॉंसे गिन रही है। 

पिछले छ: दिनों से दिन-दिनभर भरी ऑंखों से टकटकी बांधे CCU वार्ड के दरवाज़े को खुलते-बंद होते देखते रहते हैं इस उम्मीद से कि शायद पापा ऑंख खोलेंगे,कुछ शब्द आंखों से ही कहेंगे,एक बार हमको नज़रभर देख लेंगे, पर आज सारी आशाएं टूट गयी, सुबह डॉक्टर ने बुलाकर कह दिया आज का दिन वो पूरा नहीं कर पायेंगे। चुपचाप अपने पति का हाथ थामें प्रतीक्षालय की बेंच पर बैठ गये। 

 पापा जा रहे हैं हमेशा -हमेशा के लिए ये एहसास सिर्फ आंसू बनकर छाती को बींध नहीं रहे बल्कि मुझे स्मृतियों के भंवर में खींचने लगे। सारा दिन पापा की अनगिनत बातें,उनकी यादें दिल-दिमाग से लगाए बस सोचती रही 

 और रात को अस्पताल से वापस लौटकर थोड़ा सा लेटी ही थी किCCU  से फोन आ गया कि "आ जाइये"।

पापा चले गये...

आधी रात को जब पापा को बर्फ़ पर लिटाकर लौटे तो मन 

उन्हीं के पास मंडरा रहा था कैसे रात बीती कब सुबह हुई कुछ पता नहीं चला।

सुबह-सुबह अस्पताल की सारी प्रक्रिया पूरी कर पापा को लेकर घर आने के बाद मॉं को रोता-बिलखता,तड़पता,कलपता देखना, उनका दर्द महसूस करना शब्दों में बयान कर पाना मुश्किल है‌।  

हम तीन बहन ही हैं ।  मेरे पापा पिछले कुछ साल से ये कहते थे कि मेरे जाने के बाद मेरे लिए कौन करेगा  तब हम हमेशा कहते पापा आप चिंता क्यों करते हैं हम हैं न.... बोलकर उनको डॉंट भी देते थे कि आप क्यों फालतू बात सोचते हैं।  

हम अपना कहा पूरा किये पापा...

निष्प्राण पड़े पापा को देखना, पापा की अंतिम यात्रा  के पहले पंडित जी  के कहे अनुसार और श्मशान पहुंचने बाद मुखाग्नि वगैरह की सारी प्रक्रिया यंत्रवत करके घर लौटे  तो  चौखट के इस पार और उस पार  की दुनिया का अंतर स्पष्टता से उभर गया।  इस  यात्रा में पुरूषों के बीच घिरी इकलौती स्त्री के मन के शोकाकुल भाव स्वयं स्थिर हो गये। पुरूष स्त्रियों की तरह अपने मन पर बहुत देर तक दुख हावी नहीं होने देते जल्दी ही सहज हो जाते हैं। 

एक संतान से माता-पिता की जो अपेक्षा होती है वो हम पूरा किये ऐसा सब कह रहे। बाकी बचे सारे कर्म कांड नियमानुसार पालनकर,पूरी श्रद्धा और प्यार से अपने पापा की इच्छानुसार रीति-रिवाज सबकुछ निभाए।

आज बीस दिन हो गये आपको गये पापा...

कर्म कांड के बहुत सारे नियम के दिनों के अनुभव  हमें अध्यात्म से जोड़ते हैं‌ देह ,जीवन, संसार और कर्म का महत्व समझाते हैं। 

लिखना तो बहुत कुछ है पर शायद भाव हावी है मन पर।

समय जब घाव भरने लगेगा तो शायद

कुछ और साझा कर पाए...।

सबकुछ जानने -समझने के बावजूद  मेरे मन के कोने में दबी पीड़ा रह-रह कर व्यथित कर रही है। अस्पताल से लेकर श्मशान और घाट तक के सारे दृश्य फुरसत पाकर दबोच लेते हैं अचानक  से सोते से जाग जाते हैं रात-रातभर

जागते रहते हैं ,ऑंसू पलकों पर रूके हुए हैं मानो।

पापा आपकी बहुत याद आती है। आपसे बातें करने का बहुत मन होता है। बिना कुछ कहे-सुने अचानक  आपका चले जाना बहुत कचोट रहा है पापा।  

काश कि फिर एक आप गले लगाकर सर पर हाथ रख देते पापा...।

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-श्वेता

12 comments:

  1. नहीं सही जाती अपनों की पीड़ा
    सबकुछ छोड़ पापा तो गए
    पर अभी माँ है न...
    पुत्रवत् होकर मां को सम्हालिए
    वंदन

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  2. एक संतान के लिए उसके जनक का जाना एक मर्मांतक पीड़ा से गुजरना होता है, पर जीवन का यही नियम है, एक न एक दिन हरेक को इस पीड़ा का सामना करना ही होगा। समय के पास ही वह ताक़त है जो मन को पुन: ऊर्जावान बना दे, यादें, जो अभी सताती हैं, समय के साथ वे भी शक्तिदायिनी बन जाती हैं। आपके पिताजी को विनम्र श्रद्धांजलि ! ईश्वर से प्रार्थना है कि आपकी माँ व आप तीनों बहनों को इस दुख को सहने की शक्ति प्रदान करे।

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  3. नि: शब्द!
    मौन प्रणाम।
    🙏🌹।।ॐ शांति।।🌹🙏

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  4. ओह
    विनम्र श्रद्धांजलि , ईश्वर उन्हें अपने चरणों में स्थान दें. आपको हिम्मत रखना होगा हालांकि मैं बहुत अच्छी तरह जानती हूँ कि ये सिर्फ कहना आसान है.....

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  5. अभी अभी reading list खोली तो श्वेता की पोस्ट दिखी एक लम्बे समय के बाद —पापा चले गए.., हृदय आपके दुःख में दुखी है श्वेता ! विनम्र श्रद्धांजलि 🙏
    ईश्वर से प्रार्थना है कि आपको दुख को सहने की शक्ति प्रदान करे 🙏

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  6. बहुत दुख हुआ सखी,इस दुःख से मै भी अभी तक नहीं उभर पाईं, भगवान आपको सब्र दे और पापा के आत्मा को शांति 🙏🙏

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  7. प्रिय श्वेता , पितृ शोक के दारुण आघात को सहकर इस लेख में जो उदगार तुम्हारी विकल आत्मा से उमड़े हैँ वो तुम्हारी आंतरिक वेदना के परिचायक हैँ! पिता जैसे वटवृक्ष की छाया से अचानक वंचित होना जीवन का असहनीय और बहुत ही ह्रदय विदारक अनुभव है! उस पर स्नेही पिता को अंतिम क्रिया के रूप में मुखाग्नि देना, एक बेटी होकर इन क्रियाओं निभाने के लिए बहुत बड़ा दिल चाहिए! बड़ी बेटी वो भी इतनी कोमलमना और संवेदनशील बेटी के लिए बहुत कठिन है! पर सदैव पीड़ा में जीना भी संभव नहीं! ईश्वर ने यदि दुःख देने का नियम बनाया है तो हमें अपने संसारिक कर्तव्य से विमुख न होकर इस दुःख को सहने की आंतरिक शक्ति भी प्रदान की है! अपना खयाल रखो बस और माँ का भी! यही जीवन है! गर्व करो,तुम उन पिता की शिक्षित और साहसी बेटी हो जिन्होंने तुम्हें हर वो अधिकार दिया जिसकी आशा पुरुषवादी समाज एक बेटे से करता है! और जिनकी सोच समय से आगे की थी! समय तुम्हें स्वयं धीरज देगा! तुम्हें मेरी स्नेहिल सांत्वना! ईश्वर तुम्हें और मजबूत बनाये इस विषाद से उबरने में! पुनः अपना खयाल रखना और सभी अपनों का भी! हम सब तुम्हारे साथ हैं!

    इस आघात से वाकिफ हूँ
    😟
    न दुआ लगी न दवा लगी
    जाने कैसी थी नज़र लगी!
    साँसों की डोर बड़ी थामी
    जब टूटी तब न खबर लगी!
    * * * * * *
    लाख बहाए हमने आँसू, पर न लौटे जाने वाले!
    जाने कहाँ बहाई बस्ती तोड़ निकल गए मन के शिवाले 😟🙏

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  8. मैं आपके दर्द को महसूस कर सकता हूँ श्वेता जी। इस कठिन समय में हम सभी की संवेदनाएं आपके साथ हैं।

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  9. श्वेता बहुत दुख हुआ | नियति के आगे हम बौने हो जाते हैं | बस यही प्रार्थना कर सकता हूँ कि ईश्वर तुम्हें इस कठिन घड़ी में धैर्य प्रदान करे |

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  10. दुःखद
    कठिन बेला में दुःख सहन करने की शक्ति मिले

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  11. ओह!
    बहुत ही दुखद...
    अश्रुपूरित श्रद्धांजलि ,भगवान उन्हें अपने श्रीचरणों में स्थान दें।और आप सभी को इस दुख को सहने की शक्ति प्रदान करे ।

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आपकी लिखी प्रतिक्रियाएँ मेरी लेखनी की ऊर्जा है।
शुक्रिया।