मन के पाखी
*हिंदी कविता* अंतर्मन के उद्वेलित विचारों का भावांकन। ©श्वेता सिन्हा
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Tuesday, 31 March 2026
युद्ध और चिड़िया
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अबके फागुन टेसू नहीं खिले बेरंग, उदास जंगलों में पत्तों के बिछावन संगीनों की नोंक से रक्तरंजित मासूमों के दर्द सहला रहे हैं...। पतझड़ म...
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Saturday, 14 February 2026
तुम जैसे...
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तुम जैसे... स्वप्न ,स्फुरण साक्षात मायावी लोक कल्पनाओं में कामधेनु चुंबकीय इच्छाओं से सुवासित इंद्रलोक। तुम जैसे.... छुप-छुपकर भागकर देहरी ...
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Monday, 26 January 2026
एक त्योहार....
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(१) सत्तहत्तर वर्षों से ठिठुरता गणतंत्र पदचापों की गरमाहट से जागकर कोहरे में लिपटा राजपथ पर कुनमुनाता है। गवाह प्राचीर लालकिला देश की सुख-स...
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Tuesday, 11 November 2025
उदास लालकिला
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चित्र: सौजन्य गूगल लाल-किला ने हवाओं में प्रदूषण का बढ़ता ज़हर यमुना का विषैला झाग सब कुछ स्वीकार किया हर टोपी-कुरता-झंडा बहलाना फुसलाना ...
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Thursday, 7 August 2025
प्रकृति सभ्य नहीं
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पत्थरों को रगड़कर सभ्यता के उजाले में खड़ी हूँ, चमड़ी से दमड़ी तक की यात्रा में प्रगतिशीलता की धुँध पी-पीकर छाती में फफूँद जमा कर रही हूँ, पहाड़...
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Friday, 18 July 2025
तुम्हारे जन्मदिन पर--(२)
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तुम्हारे जन्म के पहले से जब तुम कोख में थी मेरे तबसे नन्ही-नन्ही अनगिनत रंगीन शीशियाँ सहेज रही हूँ तुम्हारी स्मृतियों के इत्र में भीगीं...
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Saturday, 12 July 2025
दर्द ज़रा कहने दो
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थोड़ी इंसानियत तो आदमी में रहने दो। पत्थर नहीं हो रौ जज़्बात की बहने दो।। बे-हाल लहूलुहान है वो शहर आजकल, बे-नाम सड़कों पे दरिया मरहम का बहने...
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