चित्र:साभार गूगल
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हिमयुग-सी बर्फीली
सर्दियों में
सियाचिन के
बंजर श्वेत निर्मम पहाड़ों
और सँकरें दर्रों की
धवल पगडंडियों पर
चींटियों की भाँति कतारबद्ध
कमर पर रस्सी बाँधे
एक-दूसरे को ढ़ाढ़स बँधाते
ठिठुरते,कंपकंपाते,
हथेलियों में लिये प्राण
निभाते कर्तव्य
वीर सैनिक।
उड़ते हिमकणों से
लिपटी वादियों में
कठिनाई से श्वास लेते
सुई चुभाती हवाओं में
पीठ पर मनभर भार लादे
सुस्त गति,चुस्त हिम्मत
दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ ,
प्रकृति की निर्ममता से
जूझते
पशु-पक्षी,पेड़-विहीन
निर्जन अपारदर्शी काँच से पहाड़ों
के बंकरों में
गज़भर काठ की पाटियों पर
अनदेखे शत्रुओं की करते प्रतीक्षा
वीर सैनिक।
एकांत,मौन में
जमी बर्फ की पहाड़ियों के
भीतर बहती जलधाराओं-सी
बहती हैं भावनाएँ
प्रतिबिंबित होती है
भीतर ही भीतर दृश्य-पटल पर
श्वेत पहाड़ों की
रंगहीन शाखों से
झरती हैं बचपन से जवानी तक
की इंद्रधनुषी स्मृतियाँ
"बुखारी"-सी गरमाहट लिये...,
गुनगुनी धूप के साथ
सरकती चारपाई,
मूँगफली,छीमियों के लिए
साथियों से
छीना-झपटी कुश्ती, लड़ाई,
अम्मा की गरम रोटियाँ
बाबा की झिड़की,
भाभी की बुनाई,
तिल-गुड़,नये धान की
रसीली मिठाई....,
स्मृतियों के चटखते
अलाव की गरमाहट में
साँझ ढले
गहन अंधकार में
बर्फ के अनंत समुन्द्र में
हिचकोले खाती नाव पर सवार
घर वापसी की आस में
दिन-गिनते,
कभी-कभी बर्फीले सैलाब में
सदा के लिए विलीन हो जाते हैं
कभी लौट कर नहीं आते हैं
वीर सैनिक।
#श्वेता सिन्हा

श्वेता दी,सैनिकों का जीवन कितना कठीन होता हैं, वे लोग कितनी कठिन परिस्थियों में सीमा पर डटे रहते हैं इसका बहुत ही सुंदर वर्णन किया हैं आपने।
ReplyDeleteबहुत-बहुत आभारी हूँ ज्योति दी।
Deleteसादर।
आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शनिवार 14 दिसम्बर 2019 को साझा की गई है...... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
ReplyDeleteबहुत-बहुत आभारी हूँ दी।
Deleteसादर।
सैनिको के कठिन जीवन का सजीव चित्रण किया हैं आपने ,सत सत नमन इन वीरों को
ReplyDeleteबहुत-बहुत आभारी हूँ कामिनी जी।
Deleteसादर।
जी नमस्ते,
ReplyDeleteआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार(१५ -१२ -२०१९ ) को "जलने लगे अलाव "(चर्चा अंक-३५५०) पर भी होगी।
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
….
अनीता सैनी
बहुत-बहुत आभारी हूँ प्रिय अनु।
Deleteसस्नेह शुक्रिया।
बहुत शानदार
ReplyDeleteजी बहुत आभारी हूँ...सादर शुक्रिया।
Deleteसियाचिन के बंजर श्वेत निर्मम पहाड़ों से लेकर बर्फ के अनंत समुन्द्र में हिचकोले खाती नाव तक वीर सैनिकों के जीवन का बहुत ही हृदयस्पर्शी मार्मिक शब्दचित्रण...
ReplyDeleteवाह श्वेता जी !जहाँ न जाये रवि वहाँ जाये कवि
पंक्ति को चरितार्थ करती आपकी लेखनी को शत-शत नमन🙏🙏🙏🙏
आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए अति आभारी हूँ सुधा जी ...बहुत शुक्रिया।
Deleteसादर।
सैल्यूट श्वेता जबरदस्त !!
ReplyDeleteकोई कितनी गहराई तक उतर कर कितने मोती लेकर आता है, वो आपकी ये रचना बता रही हैं,
ऐसे लगा जैसे कोई शोध किया हो आपने कोई बिना देखे कैसे यूं उकेरता है एक एक दृश्य ।
नमन ।
एक अपूर्व असाधारण रचना जिसके काव्य और भाव दोनों पक्ष अभिनव है ।
जी प्रणाम दी,
Deleteआपकी ओजपूर्ण, उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया रचना का मान बढ़ा गयी बहुत बहुत आभारी हूँ दी आपका स्नेहाशीष मिलता रहे।
बेहद शुक्रिया... सादर।
वीर सैनिक ...
ReplyDeleteमेरा सेलूट है ऐसे सभी वीरों को जो अपनी परवा नहीं कर के देश समाज की खातिर जीवन दांव पे लगते रहते हैं ...
बहुत गहरा और मन को छूने वाला लिखा है आपने ...
जी आभारी हूँ सर...बहुत शुक्रिया।
Deleteसादर।
https://bulletinofblog.blogspot.com/2019/12/2019_17.html
ReplyDeleteआभारी हूँ रश्मि जी, विशेष प्रस्तुति में अपनी रचना पढ़ना आहृलादित कर गया।
Deleteसादर शुक्रिया।
नमन
ReplyDeleteजी प्रणाम सर। सादर।
Deleteओह...मेरी रचना से भी ज्यादा सुंदर विवेचना पूर्ण और विश्लेषणात्मक प्रतिक्रिया आपने लिख दी है अमित जी।
ReplyDeleteहर पंक्ति का सूक्ष्म विश्लेषण किया आपने इतना सारा समय दिया रचना कृतार्थ हुई मेरी।
आपकी सराहना पर कुछ लिख पायें ऐसे शब्द नहीं हैं मेरे पास।
आपको सादर प्रणाम बहुत शुक्रिया।
ऐसी लंबी रचना पाठक कम ही पढ़ते है आपने मन से पढ़ा और लिखा भी उसपर।
जी सैनिक जीवन के प्रति गहरी श्रद्धा बचपन से रही है...बहुत सम्मान और आदर और स्नेह है मन में उनके लिए।
मर्मस्पर्शी कविता श्वेता जी. बर्फ़ की पहाड़ियों के भीतर बहती भावनाओं की जलधाराओं को आपने सच में महसूस किया है, और हमें भी कराया है. दिन-रात निस्वार्थ भावना से देश की पहरेदारी करने वाले इन सैनिकों के हम आजन्म ऋणी रहेंगे. पढना सार्थक हुआ.
ReplyDeleteप्रभावशाली लेखन, उत्कृष्ट सृजन - - शुभकामनाओं सह।
ReplyDeleteप्रिय श्वेता जी ,
ReplyDeleteअत्यंत मार्मिक रचना। बर्फ पर सरकती सैनिकों की जिंदगी अपने आसपास के निर्जनता को स्वीकार कर उसके अनुरूप ही ढल जाती है। तभी जनमानस का महान समुद्र खुशियों से लहराता है।बहुत सुन्दर। लेखनी सदैव चलते रहने के लिए शुभकामनाएं।
सैनिकों की जीवटता,उनके हर क्षण के संघर्ष और उनके हृदय तल में बर्फ की सतहों में दबी जलधारा सदृश भावनाओं को गहनता से व्यक्त करने वाली आपकी लेखनी को नमन श्वेता जी ! सस्नेह..,
ReplyDeleteआपने सियाचिन की ठंड ही नहीं, वहाँ खड़े सैनिकों का अकेलापन और हिम्मत भी बहुत सच्चे ढंग से दिखाया है। बर्फ, हवा और खामोशी के बीच उनकी यादें उन्हें ज़िंदा रखती हैं, यह बात बहुत गहराई से छूती है।
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