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Saturday, 24 April 2021

आत्मा



आत्मा को ललकारती
चीत्कारों को अनसुना
करना आसान नहीं होता ...

इन दिनों सोचने लगी हूँ
एक दिन मेरे कर्मों का
हिसाब करती
प्रकृति ने पूछा कि-
महामारी के भयावह समय में
तुम्हें बचाये रखा मैंने
तुमने हृदयविदारक, करूण पुकारों,
साँसों के लिए तड़प-तड़पकर मरते
बेबसों जरूरतमंदों की 
क्या सहायता की?

मैं कहूँगी-

एक सभ्य और समझदार 
जिम्मेदार नागरिक की तरह,
महामारी से बचने के लिए
निर्गत दिशानिर्देशों का
अक्षरशः पालन किया।

अपनों को खोने को विवश
शोकाकुल,
घुटती साँस,तड़पती देह लिए
छटपटाते,लाचारों को
महामारी का ग्रास बनते 
देखकर आह भरती रही।

घटते-बढ़ते आँकड़ों का
सूक्ष्म विश्लेषण करती
सत्ताधीशों की मतलबपरस्ती 
व्यवस्थाओं की नाकामयाबी को
 खूब कोसती रही ।

मैंने सकारात्मक कविता लिखी
उत्साहवर्धक भूमिकाएँ लिखीं
मेरा प्रलाप सुनकर
प्रकृति ठठाकर हँस पड़ेगी
और मैं...
अपनी अकर्मण्यता को 
आवरणहीन देखकर
लज्जा से 
 फूट-फूटकर रो पडूँगी
तब प्रकृति मुझे 
मुट्ठीभर रेत बनाकर
मरूस्थल में बिखेर देगी।
------
#श्वेता सिन्हा
अप्रैल २०२१


29 comments:

  1. आपकी भावनाओं को समझा मैंने। ऐसी ही भावनाएं सभी देशवासियों में जागृत हों, यही समय की मांग है।

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  2. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 25-04-2021) को
    "धुआँ धुआँ सा आसमाँ क्यूँ है" (चर्चा अंक- 4047)
    पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद.


    "मीना भारद्वाज"

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    Replies
    1. कृपया शुक्रवार के स्थान पर रविवार पढ़े । धन्यवाद.

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  3. आदरणीया मैम,
    आपकी इस कविता ने कुछ इस तरह से झकझोर दिया कि पढ़ने के बाद कुछ नहीं सूझा,न कोई विचार, न कोई शब्द।
    इस तरह से शुद्ध सत्य को सामने रख कर और अपने ही प्रति ही एक कठोर आंकलन निःशब्द कर दिया ।
    बस ऐसे ही रहने देतीं हूँ, कुछ कहूँगी तो इस रचना के भावों का महत्व घटाने जैसा होगा। अनेकों बार प्रणाम।


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  4. प्रिय श्वेता ,तुम्हारी रचना ने आँखें नम कर दी! से प्रगाढ़ आत्मचिंतन कहूँ या आत्मा का विकल प्रलाप, समझ नहीं आता! कदाचित्, ये वो स्थिति है कि
    जब इंसान अपने रुबरु खड़ा होता हैऔर वह हर छद्म और प्रपंच
    से रहित हो, खुद से ही आँख मिलाता है ! उसकी आत्मा पारदर्शी हो ,उसे उसके आवरणहीन अस्तित्व के दर्शन कराती है! कदाचित्, उसी स्थिति में वह अपने सबसे पास होता है और ईमानदार भी! इसी क्रम में भीतर की आवाज़ों के शोर को सुनने में सबसे अधिक सक्षम भी होता है! प्रकृति की ----क्रिया की प्रतिक्रिया वाली स्थिति से ----- जरूर डरना चाहिए! बहुत कुछ कह गयी रचना जो शायद मैं लिख भी ना पाऊँ! बस यही कहूँगी कि ये आत्मा _ आत्मा में उतर गयी! खूब लिखो, मेरी शुभकामनाएं 🌹🌹❤❤

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  5. प्रकृति सबका अलग-अलग हिसाब रखती है

    बहुत सुन्दर

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  6. आज सच ही प्रलाप ज्यादा है । इंसान खुद से नज़ारे मिला सके इतना तो करे इस महामारी के दौर में ।
    इस कविता पर कुछ कहने से बेहतर है कि हम स्वयं का आकलन करें । कहीं प्रकृति हम पर तो ठठा कर हँस तो नहीं रही ।।
    बेहतरीन रचना ।

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  7. सचमुच कभी भी आत्मसाक्षात्कार होता है तो यह प्रश्न उठता है मन में कि ऐसी विकट परिस्थिति में हमने क्या किया...बस लाचारों असहायों की व्यथाकथा सुन च्च्च च्च्च... करके अपनी कीमती जान का हर हाल में ख्याल रखते रहे...अगर प्रकृति हमें अभी तक बचाये हुए है तो कोई तो हमसे उम्मीद होगी न...पर हम सिर्फ अपने में जीते जा रहे हैं...ऐसा नहीं है कि सभी मेरे जैसे अकर्मण्य हैं बहुत से अपने लेबल पर इंसानियत की सेवा में जुटे हैं सुनकर बाद में ख्याल आता है अरे कम से कम ऐसा तो हम भी कर सकते थे...पर नहीं कर पा रहे और न कर पाने के कारण मात्र ढ़ूँढ़ते रहते हैं...।
    सभी संवेदनशील मन के भावों को शब्द दिये हैं आपने....और अंत में प्रकृति प्रदत्त सजा का सकून।
    तब प्रकृति मुझे
    मुट्ठीभर रेत बनाकर
    मरूस्थल में बिखेर देगी।
    उत्कृष्ट एवं लाजवाब सृजन।

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  8. सम्भवतः सकारात्मकता को फैलाना और उत्साह बढ़ाना, प्रकृति की नजरों में हँसने का सबब तो नहीं होगा, वह तो माँ है, माँ जो हर बच्चे की काबलियत को समझती है, वह जानती है जिससे जो बन रहा है वह अपनी तरह से इस आपदा से बचाने के लिए कर ही रहा है, यदि हम स्वयं को बचा कर रखें और हमारी वजह से कोई संक्रमित न हो तो प्रकृति माँ इसे हमारी उपलब्धि ही मानेगी। हमें आशा का दामन छोड़ना नहीं है. सुंदर सृजन !

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  9. बहुत ही सुंदर

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  10. आत्म विश्लेषण करता सृजन स्वयंका और सभी का ।ये सब का सत्य है।
    पता है लज्जा जनक है पर है यही।
    सार्थक सटीक हृदय स्पर्शी सृजन।

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  11. आपकी लिखी कोई रचना सोमवार 26 अप्रैल 2021 को साझा की गई है ,
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  12. कविता ने झकझोर दिया

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  13. वाह!श्वेता , ऐसा सृजन श्वेता ही कर सकती है । आँखें नम हो गई ।

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  14. मैंने सकारात्मक कविता लिखी
    उत्साहवर्धक भूमिकाएँ लिखीं
    मेरा प्रलाप सुनकर
    प्रकृति ठठाकर हँस पड़ेगी
    और मैं...
    अपनी अकर्मण्यता को
    आवरणहीन देखकर
    लज्जा से
    फूट-फूटकर रो पडूँगी
    तब प्रकृति मुझे
    मुट्ठीभर रेत बनाकर
    मरूस्थल में बिखेर देगी।----गहनतम लेखन...। बहुत अच्छे और गहरे विचार और शब्द। अच्छी रचना है श्वेता जी।

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  15. बहुत ही भावपूर्ण रचना लिख डाली आपने प्रिय श्वेता जी,आपके कथन से सहमत हूं, कि प्रकृति हमसे हिसाब मांगेगी,आज के परिदृश्य में हमारी अकर्मण्यता से ज्यादा हमारी बेबसी और डर हम पर हावी है,एक मनुष्य अपनी सांसों से ही मजबूर है,बहुत ही गहरी और गूढ़ रचना को हृदय से नमन करती हूं ।

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  16. निःशब्द करती अभिव्यक्ति अनुजा....

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  17. Very well said, we all should fight with this pandemic with the way we can, and by following the rules made for the society. A Front line worker giving lives and a good writer like you gives energy to the life.

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  18. असहाय है आज इंसान खुद भी ...
    कई बार बहुत कुछ चाह कर भी कर नहीं पाता ... निःशब्द करते हुवे भाव रचना के ...

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  19. हम लोग जो इस महामारी में सुरक्षित हैं, हमारा घर पर रहना, ख़ुद को खतरे में न डालना, भले ही हमें अपना नकारापन लगे कि हम इस आपदा में लोगों की जानें बचाने में अपना कुछ भी योगदान नहीं दे पा रहे...मगर ये बीमारी ही ऐसी है कि घर पर रहकर, बेवजह बाहर न निकलकर भी हम ख़ुद की और लोगों की जानें ही बचा रहे हैं। ऐसे में जिसमें जितना सामर्थ्य है वो आर्थिक योगदान भी दे रहा है भिन्न-भिन्न फाउंडेशन के ज़रिये, तो अपना दिल छोटा न करें, अपने आप पर लानत न दें।

    और फ़िर लेखक तो अपनी रचनाओं के माध्यम से योगदान देता है...प्रत्यक्ष रूप से मेन स्टेज पर न सही तो कहीं नेपथ्य में खड़ा होकर। वह अपने सृजन से लोगों को निराशा छोड़ आशा का दामन पकड़ने के लिये प्रेरित करता है, साथ ही गलत के खिलाफ़ आवाज़ उठाने को भी कहता है, तो यह भी एक सार्थक प्रयास ही है कि इंसान हिम्मत न हारे, डटा रहे...सारी चीज़ों का सामना करते हुए आगे बढ़े और अंततः विजेता बनकर बाहर निकले।

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  20. तब प्रकृति मुझे 
    मुट्ठीभर रेत बनाकर
    मरूस्थल में बिखेर देगी

    बेहतरीन रचना

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  22. नारायण से मेरी प्रर्थना है कि आपकी पंक्तियों में निहित संदेश उन सुसुप्त आत्माओं तक भी पहुँचे।
    आपको और आपकी जागृत लेखनी को मेरा सादर प्रणाम 🙏

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  23. बहुत सुंदर विचारपूर्ण प्रेरक मन को झंकृत करती हुई रचना|

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  24. प्रबल हुंकार ।

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आपकी लिखी प्रतिक्रियाएँ मेरी लेखनी की ऊर्जा है।

शुक्रिया।