Saturday, 14 February 2026

तुम जैसे...


तुम जैसे...

स्वप्न ,स्फुरण

साक्षात मायावी लोक

कल्पनाओं में कामधेनु

चुंबकीय इच्छाओं से 

सुवासित इंद्रलोक।


तुम जैसे....

छुप-छुपकर भागकर

देहरी पार,

स्वाद लेती टिकोरे

और होंठ पर 

उभर आये अपरस।


तुम जैसे...

ग्रीष्म की बेचैन रातों में

कच्ची नींद में सोई कोयल के 

स्वप्नों में अंजुरी भर

बसंत की स्मृति।


तुम जैसे...

बंद पलकों की खिड़की पर

डोलता जुगनू,

अंधेरे की उंगली में जड़ा

 नीला रत्न,

अथाह जल के बीच

घड़ियाल के पीठ पर बैठकर

उकेरे गये सपने,

अंतिम इच्छा का उत्सव। 

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-श्वेता

१४ फरवरी '२६'





Monday, 26 January 2026

एक त्योहार....

(१)
सत्तहत्तर वर्षों से
ठिठुरता गणतंत्र
पदचापों की
गरमाहट से
जागकर
कोहरे में लिपटा
राजपथ
पर कुनमुनाता है।

गवाह 
प्राचीर लालकिला
देश की सुख-समृद्धि
वैभवपूर्ण,संपूर्ण
शौर्य गाथा
अतिथियों की 
करतल ध्वनियों पर
गर्व से लहराता तिरंगा 
राजा दर्प से
और इतराता है।

झाँकियाँ रंगबिरंगी
प्रदेशों और विभागों की
सांस्कृतिक उपलब्धियाँ
 गिनवाती
नाचते-गाते 
आदमकद पुतले,
कठपुतली सरीखे 
पात्रों के साथ
मिलकर रचाते है
मनोरंजक नाटक
समझदार दर्शक 
समय समाप्ति की
प्रतीक्षा में अधीर
कृत्रिम मुसकान 
चिपकाये अलसाता है।
हमारा समृद्ध,गौरवशाली
पारंपरिक गणतंत्र
ऐसे ही मनाया जाता है।

(२)
सोच रही हू्ँ
एक दिवस और;
उत्साह और उमंग से
परिपूर्ण
राजपथ पर
सजना चाहिये
जनतंत्र दिवस के नाम
झूठी,शान बघारती,
उपलब्धियाँ
महज आँकड़े 
गिनवाने की भीड़ 
की नहीं
प्रादेशिक,आँचलिक
सामाजिक कुरीतियों,
कमियों की, 
जन हितों की 
अनदेखी की
सच्ची झाँकियाँ, 
आत्ममंथन,
कार्यावलोकन को
प्रेरित करती,
कराहते पीड़ित,वंचितों 
के लिए खुशियाँ मनाने का
कोई एक दिन तो हो
महज 
आशाओं के पंख
पर सवार
दिवास्वप्न मात्र नहीं
औपचारिकता,कृत्रिमता
से परे
जन के मन का
राष्ट्र का सत्य से 
साक्षात्कार का दिवस
एक त्योहार
ऐसा भी होना ही चाहिए।
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#श्वेता सिन्हा

Tuesday, 11 November 2025

उदास लालकिला


चित्र: सौजन्य गूगल

लाल-किला ने हवाओं में

प्रदूषण का बढ़ता ज़हर

यमुना का विषैला झाग

सब कुछ  स्वीकार किया

हर टोपी-कुरता-झंडा

बहलाना फुसलाना 

कुछ गप्प,कुछ सनसनी

लोकतंत्र की साजिशों को

इसने कभी नहीं इनकार किया

उत्साहित, जिज्ञासु 

इतिहास की गंध आत्मसात 

करने के लिए आते

हॅंसते,मुस्कुराते,खिलखिलाते

पर्यटकों के पदचापों के लिए....

एक धमाका...

आज रौंद रही है सड़कें

एंबुलेंस,दमकल गाड़ियां 

सायरन की दमघोंटू आवाजें,

वाहनों और मानवों के

अस्थि -पंजर से लिथड़े

रक्त की छींटों से रंजित 

लाल-किले तक जाने वाली सड़क

दहशत में डूबे चेहरे,

रोते -बिसूरते चंद अपने,

बहुत उदास और ख़ामोश है

लाल किला...

परिसर में दीवान-ए-आम के पीछे

संगमरमर की इक दीवार पर

उकेरे गये फूल-पौधे और चिड़िया

जो हर सुबह जीवित हो उठते थे

आगंतुकों की स्नेहिल दृष्टि से

आज सोच रहे हैं...

क्या अब वे 

चिरप्रतीक्षारत, अस्पृश्य

इतिहास का अभिशप्त पृष्ठ हो जायेंगे?

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-श्वेता

१०नवंबर २०१५

Thursday, 7 August 2025

प्रकृति सभ्य नहीं



पत्थरों को रगड़कर 
सभ्यता के उजाले में खड़ी हूँ,
चमड़ी से दमड़ी तक की यात्रा में
प्रगतिशीलता की धुँध पी-पीकर
छाती में फफूँद जमा कर रही हूँ,
पहाड़ फोड़कर,वनों को उजाड़कर
तालाब,कुएँ पाटकर
नदियों के रास्तों पर 
व्यापारिक आशियाने साटकर
आँखों में विकास की तिलिस्मी पट्टी लगाए 
अपनी  विलासिताओं के लिए
प्रकृति के वर्जित प्रदेशों में आतातायी बन
प्रकृति के विश्वास का जमकर दोहन किया मैंने,
दीमक के शहर बसाकर चाट रही जीवन को
मैं जानकर भी अनजान बनी रही कि...
धीरे-धीरे सिकुड़ती, सिमटती प्रकृति
अपनी बची-खुची शक्ति समेटने के लिए
जब-जब अगड़ाई लेती है
खोखली हुई धरती 
अपना संतुलन खो देती है।

पशु संरक्षण
पक्षी संरक्षण,
वन,भूमि,अन्न संरक्षण
पारिस्थितिकी संतुलन के लिए
जारी दिशानिर्देशों को
अनदेखा, अनसुना करती 
मैं स्वार्थी बनी 
प्रकृति को साधने का स्वप्न देखती हूँ।

किसी भी  बंधन को मानने से 
इंकार करती प्रकृति 
मेरी मनमानियों पर चेतावनी देती है
उसकी एक ज़रा-सी ठोकर पर
खिलौने की तरह बहते,
असहनीय पीड़ा से चीखते-पुकारते,
तबाही के मंज़र देख
डबडबाए मन से 
आत्ममंथन करती हुई 
सोचती हूँ...
आख़िर कब तक 
प्रकृति
शालीन बनी,सहती रहेगी मेरी यातनाएँ
मुझे भूलना नहीं चाहिए 
प्रकृति सभ्य नहीं; सहनशील है।
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-श्वेता
 ६ अगस्त २०२५
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Friday, 18 July 2025

तुम्हारे जन्मदिन पर--(२)


तुम्हारे जन्म के पहले से 

जब तुम कोख में थी मेरे

तबसे  नन्ही-नन्ही 

अनगिनत रंगीन शीशियाँ

सहेज रही हूँ 

तुम्हारी स्मृतियों के

 इत्र में भीगीं।


 प्रत्येक वर्ष

तुम्हारे जन्मदिन पर

दिनभर की भाग-दौड़ से

थमने के बाद चुपचाप

अंतरिक्ष की स्याह स्लेट पर

तुम्हारे भविष्य की तस्वीर

उकेरती हूँ

नक्षत्रों से बातें करती हूँँ

नम आँखों में तुम्हारे सुखों और

ख़ुशियों की कामना लिए

आँचल फैलाकर

दुआएँ माँगती हूँ।


और अब...

इस उम्र में 

जब देह और मन के अंतर्द्वन्द्व 

समझने का प्रयास करती

तुम्हारे मन की कोमल चिड़िया

अपनी नाज़ुक चोंच से

नभ का सबसे चमकीला तारा

 उठाना चाहती है।

अपने भीतर बसाये

कल्पनाओं की गुलाबी दुनिया में

अपना नाम टाँकना चाहती है।

मैं धैर्य और साहस बनकर

तुम्हारे स्वप्नों का 

एक सिरा थामकर अदृश्य रूप से

तुम्हारे साथ-साथ चलना चाहती हूँ।


सुनो बिटुआ....

तुम इंद्रधनुष के

इकतारे पर अपने जीवन का

संगीत लिखो,

जब भी थक जाओ 

जीवन की जटिलताओं से

मेरे आशीर्वाद को 

ओढ़ कर,

सुस्ता लेना मेरी प्रार्थनाओं के

बिछावन पर...

मैं रहूँ न रहूँ

पर एक मैं ही तो हूँ

निःस्वार्थ, निष्काम

तुम्हारी आत्मा की परछाई,

तुम्हारी स्मृतियों की खिड़की पर

आजीवन हर मौसम में 

खड़ी मिलूँगी

तुम्हारे हृदय में पवित्र

ममत्व का भाव बनकर।

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-श्वेता

१८ जुलाई २०२५

Saturday, 12 July 2025

दर्द ज़रा कहने दो


थोड़ी इंसानियत तो आदमी में रहने दो।
पत्थर नहीं हो  रौ जज़्बात की बहने दो।।

बे-हाल लहूलुहान है वो शहर आजकल,
बे-नाम सड़कों पे दरिया मरहम का बहने दो।

जज़्ब कहाँ हो पाते हैं आँखों के समुंदर,
अश्क में भीगे सपने दहते हैं तो दहने दो ।
  
काग़ज़ के कुछ फूल लगाके खिड़की पे,
बहारों के ग़म ख़ामोशी से सहने दो।

बहुत मायूस है दिल-ए- नादां समझाऊँ कैसे,
आओ न बैठो पहलू में दर्द ज़रा-सा कहने दो।

रोज़ कहती हूँ ज़िंदगी से बे-ज़ार रूह को, 
कुछ दिन और जिस्म के पिंजर में रहने दो।
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✍️श्वेता
१२ जुलाई २०२५

Wednesday, 26 March 2025

बे-मुरव्वत है ज़िंदगी


 बे-आवाज़ ला-इलाज उम्रभर मर्ज़ देती है।
बे-मुरव्वत है ज़िंदगी बे-इंतहा दर्द देती है।


जम जाते हैं अश्क आँख के मुहाने पर;

मोहब्बत की बे-रुख़ी मौसम सर्द देती है।


 ख़्वाब इश्क़ के जब भी देखना चाहो

 दिल को धप्पा, दुनिया कम-ज़र्फ़ देती है।


सीले मन के आहातों में अंधेरा कर;

बे-वफ़ाई मोहब्बत का रंग ज़र्द देती है।


ढूँढ़ते फिर रहे ज़माने भर में मरहम;

ये आशिक़ी है, बस झूठा हमदर्द देती है।


-श्वेता

२६ मार्च२०२५

 

मैं से मोक्ष...बुद्ध

मैं  नित्य सुनती हूँ कराह वृद्धों और रोगियों की, निरंतर देखती हूँ अनगिनत जलती चिताएँ परंतु नहीं होता  मेरा हृदयपरिवर...