मन के पाखी
*हिंदी कविता* अंतर्मन के उद्वेलित विचारों का भावांकन। ©श्वेता सिन्हा
Saturday, 1 August 2026
सॉंझ की बाती
Friday, 24 July 2026
ज़रा ठहरो!
तुम्हारी मुट्ठियों में ज़कड़ा हुआ ग़ुस्सा,
माथे पर तनी हुई ये बेबस सिलवटें,
और आँखों में दहकते भविष्य के सवाल-
अनदेखा करना अब आसान नहीं...
डिग्रियों को मोमबत्ती बनाकर
उजले भविष्य के स्वप्न बुनने वाले
अॕंधेरा छँटने की बजाय और घना हो रहा है
तुम हार से नहीं,
बार-बार छले जाने से आक्रोशित हो।
तुम थक चुके हो
उम्मीदों के उन खोखले विज्ञापनों से,
जो हर सुबह तुम्हारे किवाड़ पर
झूठे वादों का पिटारा छोड़ जाते हैं।
लेकिन सुनो,
यह आक्रोश जो तुम्हारी रगों में उबाल मार रहा है,
कोई अभिशाप नहीं,
तुम्हारी बची हुई जिजीविषा का प्रमाण है।
यह प्रमाण है कि तुम अभी मरे नहीं हो,
तुम व्यवस्था की खामोश बेड़ियों को
स्वीकारने से इंकार करते हो।
पर इस आग को
केवल राख बन जाने के लिए मत जलने दो।
ग़ुस्सा जब तक सिर्फ़ चीख बनकर सड़कों पर बिखरता है,
शासक की दीवारें और ऊँची हो जाती हैं।
पर यही आक्रोश
जब संकल्प का रूप लेता है,
जब यह दीवारों पर सिर पटकने के बजाय
दरवाज़े बनाने का हुनर सीखता है—
तब इतिहास रास्ता छोड़ देता है।
तोड़ो मत अपने ही हाथों से बनाया हुआ शहर,
यह देश, यह हवा, यह कल—सब तुम्हारा ही तो है।
पत्थर उठाने से ज़्यादा ताक़त
उन पत्थरों को तराशकर
एक खिड़की बनाने में है
जो अंधेरे को चीरकर अपना उजाला ख़ुद छीन लेती है।
ज़रा ठहरो,
साँस लो,
और अपने इस उबलते हुए ख़ून को
दिशा दो।
तुम सिर्फ़ इस दौर की हताशा नहीं हो,
तुम आज की लंबी, काली, घुटनभरी रात नहीं
तुम आने वाले कल की सबसे
ख़ूबसूरत सुबह हो।
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-श्वेता
Thursday, 14 May 2026
पापा चले गये...
अनुभव
पिछले छः दिनों से ऐसा लग रहा है कि मैं किसी मरघट
के प्रतीक्षालय में बैठी हूॅं। तीव्र होती मृत्यु की गंध धीरे-धीरे मन पर एक संवेदनहीनता की परत चढ़ा रही है।
अपने पापा की सबसे दुलारी, कोमल हृदय बेटी आज अस्पताल के CCU के बाहर प्रतीक्षा कक्ष में बैठी उनकी
अंतिम सॉंसे गिन रही है।
पिछले छ: दिनों से दिन-दिनभर भरी ऑंखों से टकटकी बांधे CCU वार्ड के दरवाज़े को खुलते-बंद होते देखते रहते हैं इस उम्मीद से कि शायद पापा ऑंख खोलेंगे,कुछ शब्द आंखों से ही कहेंगे,एक बार हमको नज़रभर देख लेंगे, पर आज सारी आशाएं टूट गयी, सुबह डॉक्टर ने बुलाकर कह दिया आज का दिन वो पूरा नहीं कर पायेंगे। चुपचाप अपने पति का हाथ थामें प्रतीक्षालय की बेंच पर बैठ गये।
पापा जा रहे हैं हमेशा -हमेशा के लिए ये एहसास सिर्फ आंसू बनकर छाती को बींध नहीं रहे बल्कि मुझे स्मृतियों के भंवर में खींचने लगे। सारा दिन पापा की अनगिनत बातें,उनकी यादें दिल-दिमाग से लगाए बस सोचती रही
और रात को अस्पताल से वापस लौटकर थोड़ा सा लेटी ही थी किCCU से फोन आ गया कि "आ जाइये"।
पापा चले गये...
आधी रात को जब पापा को बर्फ़ पर लिटाकर लौटे तो मन
उन्हीं के पास मंडरा रहा था कैसे रात बीती कब सुबह हुई कुछ पता नहीं चला।
सुबह-सुबह अस्पताल की सारी प्रक्रिया पूरी कर पापा को लेकर घर आने के बाद मॉं को रोता-बिलखता,तड़पता,कलपता देखना, उनका दर्द महसूस करना शब्दों में बयान कर पाना मुश्किल है।
हम तीन बहन ही हैं । मेरे पापा पिछले कुछ साल से ये कहते थे कि मेरे जाने के बाद मेरे लिए कौन करेगा तब हम हमेशा कहते पापा आप चिंता क्यों करते हैं हम हैं न.... बोलकर उनको डॉंट भी देते थे कि आप क्यों फालतू बात सोचते हैं।
हम अपना कहा पूरा किये पापा...
निष्प्राण पड़े पापा को देखना, पापा की अंतिम यात्रा के पहले पंडित जी के कहे अनुसार और श्मशान पहुंचने बाद मुखाग्नि वगैरह की सारी प्रक्रिया यंत्रवत करके घर लौटे तो चौखट के इस पार और उस पार की दुनिया का अंतर स्पष्टता से उभर गया। इस यात्रा में पुरूषों के बीच घिरी इकलौती स्त्री के मन के शोकाकुल भाव स्वयं स्थिर हो गये। पुरूष स्त्रियों की तरह अपने मन पर बहुत देर तक दुख हावी नहीं होने देते जल्दी ही सहज हो जाते हैं।
एक संतान से माता-पिता की जो अपेक्षा होती है वो हम पूरा किये ऐसा सब कह रहे। बाकी बचे सारे कर्म कांड नियमानुसार पालनकर,पूरी श्रद्धा और प्यार से अपने पापा की इच्छानुसार रीति-रिवाज सबकुछ निभाए।
आज बीस दिन हो गये आपको गये पापा...
कर्म कांड के बहुत सारे नियम के दिनों के अनुभव हमें अध्यात्म से जोड़ते हैं देह ,जीवन, संसार और कर्म का महत्व समझाते हैं।
लिखना तो बहुत कुछ है पर शायद भाव हावी है मन पर।
समय जब घाव भरने लगेगा तो शायद
कुछ और साझा कर पाए...।
सबकुछ जानने -समझने के बावजूद मेरे मन के कोने में दबी पीड़ा रह-रह कर व्यथित कर रही है। अस्पताल से लेकर श्मशान और घाट तक के सारे दृश्य फुरसत पाकर दबोच लेते हैं अचानक से सोते से जाग जाते हैं रात-रातभर
जागते रहते हैं ,ऑंसू पलकों पर रूके हुए हैं मानो।
पापा आपकी बहुत याद आती है। आपसे बातें करने का बहुत मन होता है। बिना कुछ कहे-सुने अचानक आपका चले जाना बहुत कचोट रहा है पापा।
काश कि फिर एक आप गले लगाकर सर पर हाथ रख देते पापा...।
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-श्वेता
Tuesday, 31 March 2026
युद्ध और चिड़िया
टेसू नहीं खिले
बेरंग, उदास जंगलों
में पत्तों के बिछावन
संगीनों की नोंक से रक्तरंजित
मासूमों के दर्द सहला रहे हैं...।
पतझड़ में टूटे
ज़िंदगी की शाखाओं से
वसंत आने के बाद
नये पत्ते फिर से मुस्काऍंगे
पर सैनिकों की कराहों
से बेचैन, डरी, अन्यमनस्क
बारूद की गंध से छटपटाती
तितलियों,फूलों, गौरेया के
हवाओं में बढ़ती नफरत की
मात्राओं को सोखने में असमर्थ
घबराई चिड़िया नहीं जानती
युद्ध किसलिए है...
शत्रु और मित्र की परिभाषाओं से अनभिज्ञ,
सही-गलत की सीमाओं से परे,
मृत सैनिकों की ऑंखों से
कुछ सपने चुनकर
उनके घर-आंगन में बो रही हैं
ताकि युद्ध खत्म होने के बाद
बंजर हुई धरती की दुर्दशा पर
रोते चातक की ऑंसुओं की नमी से
जब फूटेंगे
कुछ रंग और ख़ुशबू से भरे
हरे-भरे पेड़
उनकी डालियों में वो
फुदक-फुदक कर गा सकेगी
फिर से प्रेम और करुणा से भरी
३१ मार्च२०२६
Saturday, 14 February 2026
तुम जैसे...
तुम जैसे...
स्वप्न ,स्फुरण
साक्षात मायावी लोक
कल्पनाओं में कामधेनु
चुंबकीय इच्छाओं से
सुवासित इंद्रलोक।
तुम जैसे....
छुप-छुपकर भागकर
देहरी पार,
स्वाद लेती टिकोरे
और होंठ पर
उभर आये अपरस।
तुम जैसे...
ग्रीष्म की बेचैन रातों में
कच्ची नींद में सोई कोयल के
स्वप्नों में अंजुरी भर
बसंत की स्मृति।
तुम जैसे...
बंद पलकों की खिड़की पर
डोलता जुगनू,
अंधेरे की उंगली में जड़ा
नीला रत्न,
अथाह जल के बीच
घड़ियाल के पीठ पर बैठकर
उकेरे गये सपने,
अंतिम इच्छा का उत्सव।
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-श्वेता
१४ फरवरी '२६'
Monday, 26 January 2026
एक त्योहार....
Tuesday, 11 November 2025
उदास लालकिला
लाल-किला ने हवाओं में
प्रदूषण का बढ़ता ज़हर
यमुना का विषैला झाग
सब कुछ स्वीकार किया
हर टोपी-कुरता-झंडा
बहलाना फुसलाना
कुछ गप्प,कुछ सनसनी
लोकतंत्र की साजिशों को
इसने कभी नहीं इनकार किया
उत्साहित, जिज्ञासु
इतिहास की गंध आत्मसात
करने के लिए आते
हॅंसते,मुस्कुराते,खिलखिलाते
पर्यटकों के पदचापों के लिए....
एक धमाका...
आज रौंद रही है सड़कें
एंबुलेंस,दमकल गाड़ियां
सायरन की दमघोंटू आवाजें,
वाहनों और मानवों के
अस्थि -पंजर से लिथड़े
रक्त की छींटों से रंजित
लाल-किले तक जाने वाली सड़क
दहशत में डूबे चेहरे,
रोते -बिसूरते चंद अपने,
बहुत उदास और ख़ामोश है
लाल किला...
परिसर में दीवान-ए-आम के पीछे
संगमरमर की इक दीवार पर
उकेरे गये फूल-पौधे और चिड़िया
जो हर सुबह जीवित हो उठते थे
आगंतुकों की स्नेहिल दृष्टि से
आज सोच रहे हैं...
क्या अब वे
चिरप्रतीक्षारत, अस्पृश्य
इतिहास का अभिशप्त पृष्ठ हो जायेंगे?
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-श्वेता
१०नवंबर २०१५
Thursday, 7 August 2025
प्रकृति सभ्य नहीं
सभ्यता के उजाले में खड़ी हूँ,
चमड़ी से दमड़ी तक की यात्रा में
प्रगतिशीलता की धुँध पी-पीकर
छाती में फफूँद जमा कर रही हूँ,
पहाड़ फोड़कर,वनों को उजाड़कर
तालाब,कुएँ पाटकर
नदियों के रास्तों पर
व्यापारिक आशियाने साटकर
आँखों में विकास की तिलिस्मी पट्टी लगाए
अपनी विलासिताओं के लिए
प्रकृति के वर्जित प्रदेशों में आतातायी बन
प्रकृति के विश्वास का जमकर दोहन किया मैंने,
दीमक के शहर बसाकर चाट रही जीवन को
मैं जानकर भी अनजान बनी रही कि...
धीरे-धीरे सिकुड़ती, सिमटती प्रकृति
अपनी बची-खुची शक्ति समेटने के लिए
जब-जब अगड़ाई लेती है
खोखली हुई धरती
अपना संतुलन खो देती है।
पशु संरक्षण
पक्षी संरक्षण,
वन,भूमि,अन्न संरक्षण
पारिस्थितिकी संतुलन के लिए
जारी दिशानिर्देशों को
अनदेखा, अनसुना करती
मैं स्वार्थी बनी
प्रकृति को साधने का स्वप्न देखती हूँ।
किसी भी बंधन को मानने से
इंकार करती प्रकृति
मेरी मनमानियों पर चेतावनी देती है
उसकी एक ज़रा-सी ठोकर पर
खिलौने की तरह बहते,
असहनीय पीड़ा से चीखते-पुकारते,
तबाही के मंज़र देख
डबडबाए मन से
आत्ममंथन करती हुई
सोचती हूँ...
आख़िर कब तक
प्रकृति
शालीन बनी,सहती रहेगी मेरी यातनाएँ
मुझे भूलना नहीं चाहिए
प्रकृति सभ्य नहीं; सहनशील है।
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-श्वेता
मैं से मोक्ष...बुद्ध
मैं नित्य सुनती हूँ कराह वृद्धों और रोगियों की, निरंतर देखती हूँ अनगिनत जलती चिताएँ परंतु नहीं होता मेरा हृदयपरिवर...








