मन के पाखी
*हिंदी कविता* अंतर्मन के उद्वेलित विचारों का भावांकन। ©श्वेता सिन्हा
Monday, 26 January 2026
एक त्योहार....
Tuesday, 11 November 2025
उदास लालकिला
लाल-किला ने हवाओं में
प्रदूषण का बढ़ता ज़हर
यमुना का विषैला झाग
सब कुछ स्वीकार किया
हर टोपी-कुरता-झंडा
बहलाना फुसलाना
कुछ गप्प,कुछ सनसनी
लोकतंत्र की साजिशों को
इसने कभी नहीं इनकार किया
उत्साहित, जिज्ञासु
इतिहास की गंध आत्मसात
करने के लिए आते
हॅंसते,मुस्कुराते,खिलखिलाते
पर्यटकों के पदचापों के लिए....
एक धमाका...
आज रौंद रही है सड़कें
एंबुलेंस,दमकल गाड़ियां
सायरन की दमघोंटू आवाजें,
वाहनों और मानवों के
अस्थि -पंजर से लिथड़े
रक्त की छींटों से रंजित
लाल-किले तक जाने वाली सड़क
दहशत में डूबे चेहरे,
रोते -बिसूरते चंद अपने,
बहुत उदास और ख़ामोश है
लाल किला...
परिसर में दीवान-ए-आम के पीछे
संगमरमर की इक दीवार पर
उकेरे गये फूल-पौधे और चिड़िया
जो हर सुबह जीवित हो उठते थे
आगंतुकों की स्नेहिल दृष्टि से
आज सोच रहे हैं...
क्या अब वे
चिरप्रतीक्षारत, अस्पृश्य
इतिहास का अभिशप्त पृष्ठ हो जायेंगे?
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-श्वेता
१०नवंबर २०१५
Thursday, 7 August 2025
प्रकृति सभ्य नहीं
सभ्यता के उजाले में खड़ी हूँ,
चमड़ी से दमड़ी तक की यात्रा में
प्रगतिशीलता की धुँध पी-पीकर
छाती में फफूँद जमा कर रही हूँ,
पहाड़ फोड़कर,वनों को उजाड़कर
तालाब,कुएँ पाटकर
नदियों के रास्तों पर
व्यापारिक आशियाने साटकर
आँखों में विकास की तिलिस्मी पट्टी लगाए
अपनी विलासिताओं के लिए
प्रकृति के वर्जित प्रदेशों में आतातायी बन
प्रकृति के विश्वास का जमकर दोहन किया मैंने,
दीमक के शहर बसाकर चाट रही जीवन को
मैं जानकर भी अनजान बनी रही कि...
धीरे-धीरे सिकुड़ती, सिमटती प्रकृति
अपनी बची-खुची शक्ति समेटने के लिए
जब-जब अगड़ाई लेती है
खोखली हुई धरती
अपना संतुलन खो देती है।
पशु संरक्षण
पक्षी संरक्षण,
वन,भूमि,अन्न संरक्षण
पारिस्थितिकी संतुलन के लिए
जारी दिशानिर्देशों को
अनदेखा, अनसुना करती
मैं स्वार्थी बनी
प्रकृति को साधने का स्वप्न देखती हूँ।
किसी भी बंधन को मानने से
इंकार करती प्रकृति
मेरी मनमानियों पर चेतावनी देती है
उसकी एक ज़रा-सी ठोकर पर
खिलौने की तरह बहते,
असहनीय पीड़ा से चीखते-पुकारते,
तबाही के मंज़र देख
डबडबाए मन से
आत्ममंथन करती हुई
सोचती हूँ...
आख़िर कब तक
प्रकृति
शालीन बनी,सहती रहेगी मेरी यातनाएँ
मुझे भूलना नहीं चाहिए
प्रकृति सभ्य नहीं; सहनशील है।
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-श्वेता
Friday, 18 July 2025
तुम्हारे जन्मदिन पर--(२)
तुम्हारे जन्म के पहले से
जब तुम कोख में थी मेरे
तबसे नन्ही-नन्ही
अनगिनत रंगीन शीशियाँ
सहेज रही हूँ
तुम्हारी स्मृतियों के
इत्र में भीगीं।
प्रत्येक वर्ष
तुम्हारे जन्मदिन पर
दिनभर की भाग-दौड़ से
थमने के बाद चुपचाप
अंतरिक्ष की स्याह स्लेट पर
तुम्हारे भविष्य की तस्वीर
उकेरती हूँ
नक्षत्रों से बातें करती हूँँ
नम आँखों में तुम्हारे सुखों और
ख़ुशियों की कामना लिए
आँचल फैलाकर
दुआएँ माँगती हूँ।
और अब...
इस उम्र में
जब देह और मन के अंतर्द्वन्द्व
समझने का प्रयास करती
तुम्हारे मन की कोमल चिड़िया
अपनी नाज़ुक चोंच से
नभ का सबसे चमकीला तारा
उठाना चाहती है।
अपने भीतर बसाये
कल्पनाओं की गुलाबी दुनिया में
अपना नाम टाँकना चाहती है।
मैं धैर्य और साहस बनकर
तुम्हारे स्वप्नों का
एक सिरा थामकर अदृश्य रूप से
तुम्हारे साथ-साथ चलना चाहती हूँ।
सुनो बिटुआ....
तुम इंद्रधनुष के
इकतारे पर अपने जीवन का
संगीत लिखो,
जब भी थक जाओ
जीवन की जटिलताओं से
मेरे आशीर्वाद को
ओढ़ कर,
सुस्ता लेना मेरी प्रार्थनाओं के
बिछावन पर...
मैं रहूँ न रहूँ
पर एक मैं ही तो हूँ
निःस्वार्थ, निष्काम
तुम्हारी आत्मा की परछाई,
तुम्हारी स्मृतियों की खिड़की पर
आजीवन हर मौसम में
खड़ी मिलूँगी
तुम्हारे हृदय में पवित्र
ममत्व का भाव बनकर।
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-श्वेता
१८ जुलाई २०२५
Saturday, 12 July 2025
दर्द ज़रा कहने दो
Wednesday, 26 March 2025
बे-मुरव्वत है ज़िंदगी
बे-मुरव्वत है ज़िंदगी बे-इंतहा दर्द देती है।
जम जाते हैं अश्क आँख के मुहाने पर;
मोहब्बत की बे-रुख़ी मौसम सर्द देती है।
ख़्वाब इश्क़ के जब भी देखना चाहो
दिल को धप्पा, दुनिया कम-ज़र्फ़ देती है।
सीले मन के आहातों में अंधेरा कर;
बे-वफ़ाई मोहब्बत का रंग ज़र्द देती है।
ढूँढ़ते फिर रहे ज़माने भर में मरहम;
ये आशिक़ी है, बस झूठा हमदर्द देती है।
-श्वेता
२६ मार्च२०२५
Wednesday, 12 March 2025
बचाना अपने भीतर
सरक रहे हैं
तनों की सुडौल देह से
पातों के उत्तरीय,
टहनियों की नाजुक
कलाइयों से
टूटकर बिखर रही हैं
खनकती हरी चुड़ियाँ।
निर्वस्त्र हुए वृक्षों पर
पक्षियों के रहस्य और
हैं धमनियों के जाल;
टूटे,झरे,निराशा के ठूँठ पर
नन्हीं,कोमल,आशाओं से भरी
पत्ती मुस्कुराती है;
नारंगी भोर कुलाचें भरकर
टहक सांझ में बदल जाती है।
सुनो...
जीवन है पतझड़ और बसंत
कभी लगे अंत तो कभी अनंत
ऋतुओं के दंश से घबराकर
जड़ न होकर
जड़ बन जाना
हर मौसम से बे-असर रह जाना
पतझड़ में धैर्य रखकर;
वसंत और बरखा को बचाना अपने भीतर
इस संसार को सुंदर,जीवंत और
नम बनाए रखने के लिए...।
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१२ मार्च २०२५
मैं से मोक्ष...बुद्ध
मैं नित्य सुनती हूँ कराह वृद्धों और रोगियों की, निरंतर देखती हूँ अनगिनत जलती चिताएँ परंतु नहीं होता मेरा हृदयपरिवर...






