रविवार, 19 दिसंबर 2021

बदलाव का ढोंग


अंधपरंपराओं पर लिखी गयी
प्रसिद्ध पुस्तकें,
घिसी-पिटी रीति-रिवाज़ों पर आधारित
दैनंदिन जीवन के आडंबर पर
प्रस्तुत  शोधपत्र
लेख,कहानियां, कविताओं में
चित्रित मर्मस्पर्शी उद्धरण
इन्हीं सराहनीय कर्मों के अनुसार
राष्ट्रीय,अंतरराष्ट्रीय स्तर पर
विश्व पटल पर पुरस्कृत,
 सम्मानित किये जाते 
लेखक,शोधार्थी, समाजसेवी,पर्यावरणविद
और भी न जाने कौन-कौन...।

हाशिये पर पड़े 
उपेक्षितों को 
अंधविश्वास से मुक्त कर
स्वस्थ वातावरण प्रदान करने की 
मुहिम में जुटे हुए अनगिनत लोग
संकरी,दुरूह
पगडंडियों से उतरकर 
खोह में बसे
जड़ों को जकड़े अंधविश्वास के कीड़़े को
विश्वास के चिमटे से खींचकर
निकालने का उपक्रम करते हैं...।

कुछ इने-गिने बागवां
सच्चे प्रयासों की खुरपी लिए
आजीवन खोदते हैं पाताल में गुम 
कुरीतियों की जड़़ों को,
करते रहते हैं 
वैचारिकी खर-पतवार 
निकालने का यत्न,
किंतु अधिकतर 
संघर्षों की पाटी के मध्य 
पिसते, जूझते लोगों को छूकर देखते है
उनके दुख पर
संवेदना प्रकटकर
मार्मिक संस्मरणों की 
पोटली बटोरकर
पर्याप्त संसाधन जुटाने का दिलासा देकर
वापस शहर की ओर लौट जाते हैं...।
 
अंधपरंपराओं की कोठरी की
झिर्रियों से रिसता ज़हरीला धुँआ
निडर,बेखौफ़ निगलता रहता है 
अपना कमज़ोर शिकार चुपचाप
अनवरत...,
और.... 
प्रतिष्ठित सभागारों में 
कुरीतियों के लिए संघर्षरत योद्धा और 
उनकी पुस्तकें सम्मानित होती हैं, 
अंधविश्वासों को ऊपर से झाड़-पोंछकर
पहना दिया जाता है
कलफ लगा लबादा
कुछ महत्वपूर्ण तिथियों को
जुलूस,धरना,प्रदर्शन में
आक्रोश के उबलते भावुक शब्दचित्रों का 
जीवंत रूपांतरण  किया जाता है
भावनाओं की लहरों में डुबकी लगा-लगाकर
उन्हीं पुराने वाक्यांशों से
नये उद्धोष किये जाते हैं
अंधपरंपराओं को
नारों से बदलने का
संकल्प लेकर।

#श्वेता सिन्हा

गुरुवार, 16 दिसंबर 2021

समय का आलाप



शरद में 
अनगिनत फूलों का रंग निचोड़कर
बदन पर नरम शॉल की तरह लपेटकर
ओस में भीगी भोर की 
नशीली धूप सेकती वसुधा,
अपने तन पर फूटी
तीसी की नाजुक नीले फूल पर बैठने की
कोशिश करती तितलियों को 
देख-देखकर गुनगुनाते
भँवरों की मस्ती पर
बलाएँ उतारती है...
खेतों की पगडंडियों पर
अधखिले तिल के गुलाबी फूलों को
हथेलियों में भरकर
पुचकारती बासंती हवाओं की
गंध से लटपटाई वसुधा
सोचती है....
इन फूलों और
गेहूँ की हरी बालियों की
जुगलबंदी बता रही है
खेतों में शरद ने खिलखिलाहट
बो दिए हैं 
अबकी बरस
गेहूँ के साथ फूल भी खिलखिलायेंगे
तुम सुन रहे हो न
आने वाले समय का आलाप
उम्मीद का यह गीत
कितना मीठा है न..।

-श्वेता सिन्हा
१६दिसंबर २०२१

बुधवार, 8 दिसंबर 2021

सुनो सैनिक



 सुनो सैनिक
तुम्हारे रक्त का चंदन
लगाकर मातृभूमि
शृंगार करती है।
कहानी शौर्य की
अविश्वसनीय वीरता की
गाथाएँ अचंभित,
सुनकर, पढ़कर, गर्वित होकर  
श्रद्धानत वंदन
भीरू मन को भी
धधकता अंगार करती है।

सुनो सैनिक...!
हृदय में अपने
तिरंगा टाँकना,
रगो को देशभक्ति के
नमक से पाटना
माटी के लिए
तुम्हारा जीवन स्पंदन
तुम्हें बहुमूल्य,
मनुश्रेष्ठ हार करती है।
ओ सरहद के अडिग चट्टान
तुम्हारी छत्रछाया
अदृश्य वन नंदन,
 तुम्हारा बलिदान
तुम्हें सुवासित
हरसिंगार करती है।
तुम्हारे रक्त का चंदन
लगाकर मातृभूमि
शृंगार करती है।
 नमन बारंबार करती है।


#श्वेता सिन्हा
८ दिसम्बर२०२१
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गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

उम्मीद



बेतरतीब उगी हुई
घनी जंगली घास-सा दुख
जिसके नीरस अंतहीन छोर के
उस पार कहीं दूर से
किसी हरे पेड़ की डाल पर
बोलती सुख की चिड़िया का 
मद्धिम स्वर 
उम्मीद की नरम दूब-सा
थके पाँव के छालों को
सहलाकर कहती है-
ज़िंदगी के सफ़र का
 खूबसूरत पड़ाव
 तुम्हारी प्रतीक्षा में है। 


बहुत पास से गुज़रा तूफान
धरती पर लोटती
बरगद,पीपल की शाख,
सड़क के बीचोबीच पसरा नीम
असमय काल-कलवित  
धूल-धूसरित,गुलमोहर की
डालियाँ, पत्तियाँ, कलियाँ 
 पक्षियों के घरौंदे,
बस्ती के कोने में जतन से बाँधी गयी
नीली प्लास्टिक की छत,
कच्ची माटी की भहराती दीवार
अनगिनत सपनें
बारिश में बहकर नष्ट होते देखती रही
उनके दुःख में शामिल हो 
शोक मनाती रही रातभर उनींदी
अनमनी भोर की आहट पर
पेड़ की बची शाखों पर
 घोंसले को दुबारा बुनने के उत्साह से
 किलकती तिनका बटोरती
 चिड़ियों ने खिलखिलाकर कहा-
एक क्षण से दूसरे क्षण की यात्रा में
 समय का शोकगीत गाने से बेहतर है
 तुम भी चिड़िया बनकर
उजले तिनके चुनकर 
 चोंच मे भरो और हमारे संग-संग
 जीवन की उम्मीद का
गीत गुनगुनाओ।

#श्वेता सिन्हा
३ दिसंबर २०२१


गुरुवार, 25 नवंबर 2021

जो मिल न सका



साँसों की लय पर
चल रही हूँ ज़िंदगी की रगो में
पर किसी की साँसें न हो सकी।

किसी के मन की 
ख़्वाहिशों की ढेर में शामिल
अपनी बारी की प्रतीक्षा में ख़ुद से बिछड़ गयी।

समय की डाल पर खिली
किसी पल पर मर मिटने को बेताब कली
मौसम की रूखाई से दरख़्त पर ही सूख गयी।

जिसकी गज़ल का
दिलकश रुमानी मिसरा होने की चाह थी
उसकी किताब में सवालों का पन्ना बन गयी।

इच्छाओं की बाबड़ी, 
सतह पर तैरते अतृप्ति के दानों के दुख में
तल में भरी अनगिन खुशियों से अंजान रही। 

जो मिल न सका
उसको छूने की तड़प नदी में बहाकर
अब चिड़िया हो जाना चाहती हूँ।

चाँद से कूदकर
अंधेरे में गुम होते सपनों से बेपरवाह
अब दिल के किवाड़ पर चिटकनी चढ़ाकर 
गहरी नींद सोना चाहती हूँ।

#श्वेता सिन्हा
२५ नवंबर २०२१


शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2021

नवरात्र



 माँ 
इस सृष्टि का सबसे कोमल,स्नेहिल, पवित्र, शक्तिशाली ,सकारात्मक एवं ऊर्जावान भाव,विचार या स्वरूप है।
सूर्य,चंद्र,अग्नि,वायु,वरूण,यम इत्यादि देवताओं जो प्रकृति में स्थित जीवनी तत्वों के अधिष्ठाता हैं, के अंश से उत्पन्न देवी का आह्वान करने से तात्पर्य  मात्र विधि-विधान से मंत्रोच्चार पूजन करना नहीं अपितु अपने अंतस के विकारों को प्रक्षालित करके दैवीय गुणों के अंश को दैनिक आचरण में जागृत करना है।
 मानवता,प्रेम,करुणा, परोपकार, क्षमा और सहनशीलता जैसे संसार के सबसे कोमल भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती माँ खड्ग,चक्र,त्रिशूल, कृपाण,तलवार ढाल से सुशोभित
है,जो सिंह को वश में करती है, जो आवश्यकता होने पर फूलों की कोमलता त्यागकर ज्वालामुखी का रूप धारण कर शत्रुओं को भस्म करती है।
व्रत का अर्थ अपनी वृत्तियों को संतुलित करने का प्रयास और उपवास का अर्थ है अपने इष्ट का सामीप्य।
अपने व्यक्तित्व की वृत्तियों रजो, तमो, सतो गुण को संतुलित करने की प्रक्रिया ही दैवीय उपासना है।
देवी के द्वारा वध किये दानव कुवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं जैसे-
महिषासुर शारीरिक विकार का द्योतक है
चंड-मुंड मानसिक विकार,
रक्तबीज वाहिनियों में घुले विकार,
ध्रूमलोचन दृश्यात्मक वृत्तियों का प्रतिनिधित्व करता है,
शुम्भ-निशुम्भ भावनात्मक एवं अध्यात्मिक।
प्रकृति के कण-कण की महत्ता को आत्मसात करते हुए
ऋतु परिवर्तन से सृष्टि में उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा का संचयन करना और शारीरिक मानसिक एवं अध्यात्मिक विकारों का नाश करना नवरात्रि का मूल संदेश है।
इस साधना से आत्मबल इतना मजबूत बने कि हम दैनिक जीवन के संघर्षों में किसी भी परिस्थिति पर संयम और प्रयास से विजय प्राप्त कर सके,अभीष्ट की प्राप्ति कर सकें। 
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बुधवार, 29 सितंबर 2021

स्त्रियोंं ने जिलाए रखा है

संवेदना से भरी
साधारण स्त्रियाँ   
अपनी भावनाओं को ज्ञानेंद्रियों
से ज्यादा महसूसती है
स्नेहिल रिश्तों को
नाजुक डोर की
पक्की गाँठ से बाँधकर
स्वजनों के अहित,उनसे बिछोह की
कल्पनाओं के भय को
व्रत,उपवास के तप में गलाकर
अपनी आत्मा के शुद्ध स्पर्श से 
नियति को विनम्रता से
साधने रखने का उपक्रम करती हैं
साधारण स्त्रियों ने जिलाए रखा है
सृष्टि में ईश्वर का अस्तित्व।
 
तुलसी पूजती हैं
आँवला, पीपल,बड़ के तने पर
कच्चे सूत बाँधती हैं
जौ रोपती हैं
करम की डाल आँगन में रोपकर
पति,बच्चों,भाई के लिए
मंगलकामना करती है
नदियों को पूजती हैं
पत्थरों को पूजती हैं
सूरज, चाँद और सितारे पूजती है
वृक्ष, फल,फूल,नदियाँ,
खेत,माटी,पशु,पक्षी,पत्थर पूजती हैं
सृष्टि के स्रष्टा के समक्ष नतमस्तक
अपनी भावनाओं की परिधि 

में संजोए दुनिया की सुरक्षा के लिए
अपनी दिनचर्या में
प्रकृति की सच्ची साधिकाएँ
साधारण स्त्रियों ने जिलाए रखा है
प्रकृति की सार्थकता।

बुद्धि और तर्क से रिक्त

समानता के अधिकारों से विरक्त
अंधविश्वास और अंधपरंपराओं के
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तटस्थ
पति और बच्चों में
एकाकार होकर
खुशियाँ मनाती हैं
नाचती,गाती पकवान बनाती हैं
सजती हैं, सजाती है
शुष्क जीवन को रंगों से भर देती हैं 
पुरातन काल से आधुनिक 
इतिहास की यात्रा में
सूचीबद्ध स्त्रियोंं और पुरुषों की
अनगिनत असहमतियों और असमानताओं की
क्रूर और असभ्य कहानियों के बावजूद
पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत में
संस्कृतियों से भरे संदूक की
चाभियाँ सौंपती
साधारण स्त्रियोंं ने जिलाए रखा है
 लोकपरंपराओं  का अस्तित्व।
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-श्वेता सिन्हा
२९ सितंबर २०२१


बुधवार, 22 सितंबर 2021

तुमसे प्रेम करते हुए-(२)



(१)

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भोर की पहली 
किरण फूटने पर 
छलकी थी 
तुम्हारी मासूम मुस्कान की
शीतल बूँदें
जो अटकी हैं अब भी
मेरी पलकों के भीतरी तह में
बड़े जतन से
रख दिया है 
साँसों के समुंदर में
तुम्हारे जाने के बाद 
जब-जब भावों की लहरें 
छूती है मन के किनारों को
जीवन के गर्म रेत पर
बिखरकर इत्र-सा
मुस्कान तुम्हारी
 हर पल को
सोंधा कर जाती है।
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(२)
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मेरे दिल से तुम्हारे मन तक
जो भावनाओं की नदी बहती है
निर्मल कल-कल,छल-छल,
जिसकी शीतल,मदिर धाराएँ
रह-रह कर छूती है
आत्मिक अनुभूति के 
सुप्त किनारों को
सोचती हूँ 
निर्बाध बहती जलधारा में
जो नेह के 
छोटे-छोटे भँवर हैं
उसमें  
प्रवाहित कर दूँ
हमारे बीच के
अजनबीपन,औपचारिकता
की पोटलियों को।

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-श्वेता सिन्हा
(उन दिनों)

रविवार, 19 सितंबर 2021

नामचीन स्त्रियाँ


नामचीन औरतों की
लुभावनी कहानियाँ

क्या सचमुच
बदल सकती हैं
हाशिये में पड़ी
स्त्री का भविष्य...?

उंगलियों पर
गिनी जा सकने वाली
प्रसिद्ध स्त्रियों को
नहीं जानती
पड़ोस की भाभी,चाची,ताई,
बस्ती की चम्पा,सोमवारी
लिट्टीपाड़ा के बीहड़
में रहनेवाली
मंगली,गुरूवारी
स्पोर्ट्स शू पहने
मंगला हाट से खरीदे
आधुनिक कपड़ों में
सेल्फी खींचकर ही
खुश हो लेती हैं
सयानी होती
पाँचवी तक पढ़ी
बुधनी,सुगनी।

अलग-अलग उम्र में
अलग-अलग पुरूषों के द्वारा
चलायी जाती
चाभीवाले खिलौने जैसी स्त्रियाँ..
टपकते छत के दुख में दुबराती
अपने नाते-रिश्तेदारों का
व्यवहार विश्लेषण करती
नामचीन औरतों के
बनाव,शृंगार
पहनावा-ओढ़ावा पर विमर्श कर
खुश हो लेती हैं।

देहरी के बाहर
कुछ मील में बिखरे
माँ,नानी,दादी के द्वारा
बार-बार दिखाए गये
सपनों को बीनने के क्रम में
ताकभर लेती हैं
देहात के मेले में लगे
रंगीन पोस्टरों की तरह
लगने वाली  स्त्रियों को
कौतुहलवश,
क्योंकि उसे पता है
सपनों के विभिन्न प्रकार में
देहरी के बाहर 
पाँव पसारते ही उसके सपनों को
रिवाज़ के फंदे में 
लटका दिया जाएगा।

नामचीन स्त्रियों से
अनभिज्ञ स्त्रियाँ
नहीं बदल सकती
ढर्रे में चलती
एकरस जीवन में कुछ भी,
नहीं बदल सकती 
समाज की आँखों का पानी,
क्रांति नहीं ला सकती,
फ़ेमिनिज़्म शब्द का
अर्थ भी नहीं समझती
स्त्री आंदोलनों के नारों से
उसे कोई सरोकार नहीं
किंतु 
नामचीन स्त्रियों की भाँति ही
सृष्टि के संचालन का दायित्व
पूरी निष्ठा से निभाती हैं
भूत,वर्तमान और भविष्य 
पोषती हैं
बनकर प्रकृति का 
जिम्मेदार प्रतिरूप।
------------
#श्वेता सिन्हा
१९ सितंबर २०२१

गुरुवार, 16 सितंबर 2021

तुमसे प्रेम करते हुए-(१)



आज भी याद है मुझे
तुम्हारे एहसास की वो
पहली छुअन
दिल की घबरायी धड़कन
सरककर पेट में 
तितलियां बनकर
उड़ने लगी थी,
देह की थरथराती धमनियों में
वेग से उछलती
धुकधुकी के स्थान पर
आ बैठी थी 
नन्ही-सी बुलबुल
बेघर कर संयत धड़कनों को
अपना घोंसला
अधिकारपूर्वक बनाकर
तुम्हारे मन का प्रेम गीत 
गुनगुनाती हुई
किया था दुनिया से बेख़बर... 
उस स्वर की अकुलाहट से बींधकर
मन से फूटकर नमी फैल गयी थी
रोम-रोम में
जिसके 
एहसास की नम माटी में
अँखुआये थे 
अबतक तरोताज़ा हैं
साँसों में घुले
प्रेम के सुगंधित फूल ।

#श्वेता सिन्हा




 

रविवार, 5 सितंबर 2021

बदले दुनिया(शिक्षक)

शिक्षक मेरे लिए मात्र एक वंदनीय शब्द नहीं है, न ही मेरे पूजनीय शिक्षकों की मधुर स्मृतियाँ भर ही।
मैंने स्वयं शिक्षक के दायित्व को जीया है।
मेरी माँ सरकारी शिक्षिका रही हैं,मुझसे छोटी मेरी दोनों बहनें भी वर्तमान में सरकारी शिक्षिका हैं। 
उनके शिक्षक बनने के सपनों से यथार्थ तक की मनोव्यथा को शब्द देने का यह छोटा सा प्रयास है।


संगीत नहीं मैं सदा साज बनाऊँगी। 
टूटी कश्तियों से ज़हाज़ बनाऊँगी।।
ककहरे में ओज, नवचेतना भर दूँ,
बदले दुनिया वो आवाज़ बनाऊँगी।
 
पढ़ाकर भविष्य संवारूँगी
शिक्षक बनकर बदल दूँगी
सरकारी विद्यालय की छवि,
खूब सिखलाऊँगी बच्चों को
बनाऊँगी एक-एक को रवि।
कच्चे स्वप्नों में भरकर पक्के रंग
सुंदर कल और आज बनाऊँगी 
बदले दुनिया वो आवाज़ बनाऊँगी।

सोचा न था सुघढ़ गृहणी की भाँति
करना होगा चावल-ईंधन का हिसाब, 
कक्षा जाने के पूर्व बरतनों की गिनती
भरनी होगी पक्के बिल की किताब।
बही-ख़ातों की पहेली में उलझी 
कागज़ों में आसमान की कल्पना कर,
कैसे मैं नन्हें परिंदों को बाज़ बनाऊँगी?
बदले दुनिया वो आवाज़ बनाऊँगी 

कितने एसी,एसटी, बीसी 
कितने जनरल  हुए दाखिल
आधार बने कितनों के और
खाते में क्रेडिट हुए कितने फ़ाजिल,
अनगिनत कॉलमों को भरने में
महारथी शिक्षक द्रोण से हुए अर्जुन 
सामान्य ज्ञान के रिक्त तरकश, अब कैसे
लक्ष्य जो भेद सके तीरंदाज़ बनाऊँगी ?  
बदले दुनिया वो आवाज़ बनाऊँगी।

कभी एस.एम.सी कभी पी.टी.ए 
मीटिंग सारी बहुत जरूरी है
भांति-भांति के रजिस्टर भरना
कर्तव्य नहीं हमारी मजबूरी है
पढ़ाने के बदले अभियान पूरा करो
विभागीय फरमान मूल्यों से ऊपर है
सूख रही गीली माटी  कैसे अब
गढ़ साँचों में राष्ट्र का ताज़ बनाऊँगी?   
बदले दुनिया वो आवाज़ बनाऊँगी।

चोंचलों के चक्रव्यूह में घिरकर
चाहकर भी गुरू नहीं बन पाती हूँ
शिक्षण की चाह दबाकर मन में
अपने फर्ज़ ईमानदारी से निभाती हूँ 
फिर भी आशाओं के परिणाम पत्र में 
ऋणात्मक अंक लिए अनुत्तीर्ण हो जाती हूँ
उम्मीद की पोटली लिए सफ़र में हूँ
एकदिन सपनों के अल्फ़ाज़ बनाऊँगी
बदले दुनिया वो आवाज़ बनाऊँगी।

#श्वेता सिन्हा
५ सितंबर २०२१


सोमवार, 30 अगस्त 2021

स्व पर विश्वास


 अवतारों की प्रतीक्षा में
स्व पर विश्वास न कम हो
तेरी कर्मठता की ज्योति
सूर्यांश,तारों के सम हो।

सतीत्व की रक्षा के लिए
चमत्कारों की कथा रहने दो,
धारण करो कृपाण,कटार
आँसुओं को व्यर्थ न बहने दो। 
व्याभिचारियों पर प्रहार प्रचंड
उष्मा ज्वालामुखी सम हो।
अवतारों की प्रतीक्षा में
स्व पर विश्वास न कम हो।

प्रार्थनाओं में,ध्यानस्थ होकर
बस टेर लगाना पर्याप्त नहीं,
भावनाओं की जड़ों को सींचो
मानवीय मूल्य सर्वव्याप्त नहीं। 
अपने जीवन के कुरूक्षेत्र में 
तुम ही अर्जुन के सम हो।
अवतारों की प्रतीक्षा में
स्व पर विश्वास न कम हो।

करो कृष्ण को महसूस 
सद्कर्म कल्कि का अंश है, 
प्रेम,दया,सत्य में अमिट 
हर युग में कृष्ण का वंश है।
संवेदनाओं को जीवित रखो,
मनुष्यता का मर्म कृष्ण सम हो। 
अवतारों की प्रतीक्षा में
स्व पर विश्वास न कम हो।


#श्वेता सिन्हा
३० अगस्त २०२१

शुक्रवार, 27 अगस्त 2021

विचार

विचार
मन के कोरे कैनवास पर
मात्र भावनाओं की
बचकानी या परिपक्व कल्पनाओं के
खोखले कंकाल ही नहीं गढ़ते
विचार बनाते है 
जीवन के सपाट पृष्ठों पर
सफल-असफल भविष्य के 
महत्वपूर्ण रेखाचित्र। 

 विचार
चाक पर रखे गीली मिट्टी को
धीरे-धीरे थपथपाकर
गढ़ते हैं  विविध पात्र,
पकाते हैंं भट्टियों में
ताकि मिट्टी का स्वप्न
आकार लेकर 
मजबूत भविष्य बने।
 
 विचार
बीज से वृक्ष तक की यात्रा में
अपनी नाजुक टहनियों से
सुदृढ़ तना होने तक
तितलियों और परिंदों को
देते हैं भय से मुक्ति,
साहस,सुरक्षा और उड़ान
या फिर स्व के इर्द-गिर्द लिपटे
अपने बिल में सिमटे सरीसृपों-सा
रीढ़विहीन संसार।

विचार
असमर्थता की माँद में सोती
मासूम नींद की
अपरिभाषित,अपरिचित,
नवजात दृश्यों के स्पर्श का 
निरीह कर्त्तव्यबोध होता है,
बहती धाराओं के तल के अनजान
नुकीले पत्थरों से
क्षतिग्रस्त मछलियों के पंख, 
इच्छाओं के विरूद्ध 
असंभवों को जीतने की विफलताओं की
अनंत व्यथाएँ
कभी सूखने नहीं देता
विचारों का गीलापन।

विचार
अपने विभिन्न प्रकारों में
अच्छे-बुरे
शुद्ध-अशुद्ध
ऐच्छिक-अनैच्छिक
परिपक्व-अपरिपक्व की
परिभाषाओं में
 गूढ़ पहेलियों के
अनजान छोर को ढूँढने में 
अधिकांशतः
परिस्थितियों के अनुरूप 
बुलबुले-सा विलीन हो जाते हैं
जीवन के निरंतर बहाव में...
परंतु कुछ विचार
सामान्य अवधारणाओं के
शिलापट्ट को कुरेदकर
पथप्रदर्शक के
अमिट पदचिह्न बनाकर
अमरत्व प्राप्त करते है।
------------
श्वेता सिन्हा
२७ अगस्त २०२१


बुधवार, 18 अगस्त 2021

बौद्धिक आचरण



 बर्बरता के शिकार
रक्तरंजित,क्षत-विक्षत देह,
गिरते-पडते,भागते-कूदते
दहशत के मारे
आत्महत्या करने को आमादा
लोगों की
तस्वीरों के भीतर की
सच की कल्पना
भीतर तक झकझोर रही है।

पुरातात्विक विश्लेषकों के साथ
सभ्यताओं की 
अंतिम सीढ़ी पर लटके 
जिज्ञासुओं की भाँति
देखकर अनुमान के आधार पर 
अधजली लाशों का बयान,
मुर्दा इंसानियत की आपबीती का 
शाब्दिक विश्लेषण
बौद्धिक क्षमता का प्रदर्शन
मुर्दाघर में कार्यरत कर्मचारियों की भाँति
यंत्रचालित व्यवहार-सा प्रतीत होने लगता है। 

स्व,स्वजन को सुरक्षित मानकर
सहयोग के किसी भी रूप से
दूसरे कबीलों की कठिन 
परिस्थितियों पर
उसका संबल न बनकर
व्यंग्यात्मक प्रहार,उपदेश और ज्ञान की
बौछार
मूढ़ता है या असंवेदनशीलता?
यह मात्र मानवता से जुड़ा प्रश्न नहीं
बौद्धिक आचरण का 
सूक्ष्म विश्लेषण है।

किसी भी दौर में
ज़ुबान काटकर,
हाथ पैर बाँधकर,
ताकत और हथियारों के बल पर
सत्ता स्थापित करने की  कहानियाँ 
इतिहास के लिए नयी नहीं...,
नयी तो होती है
पुनर्जन्म लेकर भी 
गुलामों की फौज में शामिल होने की 
अपरिवर्तित प्रवृतियाँ,
हर बार आतातायियों के समर्थन में
गूँगों के निहत्थे समूहों को डराकर
इतिहास के प्रसिद्ध उद्धरणों को भूलकर,
स्वयं को सर्वशक्तिमान 
समझने का दंभ भरना
विनाश के बीज से
फूटने वाले अंकुर का
पूर्वाभासी गंध है।
---------------

#श्वेता सिन्हा
१८ अगस्त २०२१

रविवार, 15 अगस्त 2021

प्रणाम...(शहीदों को )



करती हूँ प्रणाम उनको,शीश नत सम्मान में है,
प्राण दे,इतिहास के पृष्ठों में अंकित हो गये
जिनकी लहू की बूँद से माँ धरा पावन हुई
माटी बिछौना ओढ़ जो तारों में टंकित हो गये।

चित्रलिखित चित्त लिए चिता सजाते पुत्र की 
क्षीर, नीर, रिक्त आँचल स्मृतियाँ टटोले सूत्र की,
मौली,रोली राखी टीका बचपना धर कंठ में 
देश की रज भाल पर मल जो चंद्रांकित हो गये।

पोंछकर सिंदूर अपना शृंगार करती देश का
देह,मन औ प्रीत समिधा शांति यज्ञ परिवेश का,
तपस्विनी तेजोमयी के चक्षुओं से स्वप्न झरकर,
शिखर पर हिम के तिरंगे संग रेखांकित हो गये।

स्वतंत्रता का गीत दिव्यात्माओं का उपहार है
शौर्य गाथा पीढ़ियों की स्वदेश प्रेम का सार है
नमन है उनको प्रथम, बलिदान जो अज्ञात हैं
हो विलोपित पटल से हृदय में शीर्षांकित हो गये।
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-श्वेता सिन्हा
१५ अगस्त २०२१


बुधवार, 28 जुलाई 2021

कठपुतलियाँ


मुंडेर पर
दाना चुगने आती
चिडियों के टूटे पंख
इकट्ठा करती,
नभ में उड़ते देख
उनके कलरव पर
आनंदित होती
मैं चिड़िया हो जाना
चाहती हूँ,
मुझे चिड़िया पसंद है
क्योंकि अबूझ भाषा में
मुझसे बिना कोई प्रश्न किये
वो करती हैं मुझसे संवाद।

मखमली,कोमल,
खिलती कलियों, फूलों की
पंखुड़ियों को छूकर सिहरती हूँ
मुरझाये फूल देख
उदास हो जाती हूँ,
हवा में डोलते फूल देख
मुग्ध हो मुस्कुराने लगती हूँ,
मुझे फूल पसंद है
क्योंकि फूल नहीं टोकते मुझे
मेरी मनमानी पर।

आसमान में टँके
सूरज,चंदा से
छिटके मोतियों से
शृंगार करती,
बादलों की ढेरियों 
तारों के झुंडों में
सहज विचरती हूँ
मेरे आँगन में सांझ ढले
जादुई परियाँ आकर
जी-भर बतियाती है
मुझे मेरी कल्पनाओं की
आकाशगंगा पसंद है,
क्योंकि यथार्थ की
सारी पीड़ा ढककर
मुझे छुपा लेती है
अपनी बाहों में।

नदी,ताल,झील,झरनों की
निश्छल खिलखिलाहट
मुझे मछली बना देती हैं
मैं तैरती पानी के बीच
चट्टानों में बैठी 
प्रेमगीत गुनगुनाने लगती हूँ,
मुझे समुंदर की
अगड़ाईयाँ पसंद है
क्योंकि मेरे आक्रोश का 
उफ़ान सहकर भी
छिड़कता है अपनी शीतलता
बिना मेरी गलती बताये।

प्रकृति का मौन सानिध्य
मुझे मनुष्यों से ज्यादा
पसंद है,
यद्यपि प्रकृति का अंश है मानव
तथापि 
प्रकृति मुझसे मेरी
कमजोरियों पर प्रश्न नहीं करती
गणित की कमज़ोर छात्रा
तर्क-वितर्क के समीकरणों में उलझने
से बचना चाहती हूँ,
प्रश्नों के जाल को सुलझाने की
जटिलताओं से घबराकर
अपनी सहूलियत से
अपनी मनमर्जी से 
निरंकुश होकर जीने की
महत्वाकांक्षा में
जीवंत
 प्रकृति की ओट लेकर
परिस्थितियों को 
अपने मनोनुकूल
गढ़ने की लिप्सा में
पसंद करने लगती हूँ
 कठपुतलियाँ।

#श्वेता सिन्हा
२८जुलाई २०२१


 

रविवार, 18 जुलाई 2021

नन्ही बुलबुल


कच्ची उमर के पकते सपने
महक जाफ़रानी घोल रही है। 
घर-आँगन की नन्ही बुलबुल
हौले-हौले पर खोल रही है।

मुस्कान,हँसी,चुहलबाज़ी
मासूम खेल की अनगिनी बाज़ी
स्मृतियों की गुल्लक में
उम्र रेज़गारी जोड़ रही है।

घर-आँगन की नन्ही बुलबुल
हौले-हौले पर खोल रही है।

क़लम,कॉपी किताब की दुनिया
बाँध कलाई से समय की पुड़िया,
विस्तृत प्रागंण में नभ के
 स्वप्नों की डिबिया टटोल रही है।

घर-आँगन की नन्ही बुलबुल
हौले-हौले पर खोल रही है।

 बादल,बारिश,जंगल,जुगनू
 सूरज,चंदा,तारों के घुँघरू,
मीन नयन की टोह लिए
नौका लहरों पर डोल रही है।

चटक-चटक आकाश झरे,
दिग्दिगंत अचरज से भरे,
कैनवास पर उड़ती तितली
रहस्य नक्षत्र के बोल रही है।

घर-आँगन की नन्ही बुलबुल
हौले-हौले पर खोल रही है।

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#श्वेता सिन्हा
१८ जुलाई २०२१



 

रविवार, 11 जुलाई 2021

प्रेम में डूबी स्त्री


चित्र : मनस्वी
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 प्रेम में डूबी स्त्री----
 प्रसिद्ध प्रेमकाव्यों की
बेसुध नायिकाओं सी 
किसी तिलिस्मी झरने में
रात-रातभर नहाती हैं
पेड़ की फुनगियों पर टँकें
इंद्रधनुष की खुशबू 
समेटकर अंजुरी से
मलकर देह पर
मत्स्यगंधा सी इतराती हैं।

प्रेम में डूबी स्त्री---
तितलियों की पीठ पर 
उड़ती हुई 
छुप जाना चाहती है अंतरिक्ष में
शाम ढले 
तोड़कर चाँद से
ढेर सारी कतरनें
प्रियतम के सपनों की ज़ेब में
भरना चाहती है,
कभी किसी घुटनभरे अंधेरे में
जो बिखरकर 
उजाला कर दे।
 
प्रेम में डूबी स्त्री ----
 स्मृतियों की पाती 
 बाँचती हुई
शब्दों की छुअन से
विह्वल होकर
धुँआ-धुँआ आँखों से
बहाती हैं
गंगाजल-सी 
पवित्र बूँदें
जिससे चला करती हैं
उसकी बंजर साँसें। 

प्रेम में डूबी स्त्री-
दुधमुंहे बच्चे सी
मासूम,निर्मल,
भावुकता से छलछलाती हुई
बेवजह हर बात पर हँसती,
विकल हो ज़ार-ज़ार रोती,
अकारण ही मुस्कुराती हैं
सही-गलत के
तर्कों में उलझे बिना
 प्रेम की गंध से मतायी
 फतिंगा बन 
आग को चूमकर
राख सी झर जाती हैं।

प्रेम में डूबी स्त्री---
मछली जैसी होती हैं
स्वयं में खोयी
मचलती रहती हैं
प्रेम की धाराओं में
बेआवाज़ गुनगुनाती हुई 
राह भूलकर
मछुआरे की नाव पर 
सवार होकर
एक दिन हो जाती है
टूटता सितारा।

प्रेम में डूबी स्त्री---
अनगिनत रूप धारण करती है
प्रेम के...
बाँधकर रखती है
अपने दुपट्टे की छोर से
भावनाओं की महीन चाभियाँ
और
बचाए रखती है
सृष्टि में प्रेम के बीज...।


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#श्वेता सिन्हा
११ जुलाई २०२१


रविवार, 4 जुलाई 2021

जूझना होगा


त्म हो रही
आशाओं से
ठहरने की विनती करना
व्यर्थ है,
उन्हें रोकने के लिए
जूझना होगा नैराश्य से
आशा को निराशा के जबड़े से
खींचते समय उसकी
नुकीली दंतपंक्तियों से
लहुलूहान उंगलियों के
घावों को
करना होगा अनदेखा।

जूझना होगा...
झोली फैलाये, भाग्य भरोसे
नभ ताकती अकर्मण्यताओं से...
आशा की चिरौरी में
बाँधी गयी मनौतियों के कच्चे धागे 
प्रार्थनाओं की कातर स्वर लहरियों से
अनुकम्पा बरसने की बाँझ प्रतीक्षा को 
बदलना होगा उर्वरता में
 जोतने होंगे 
 कर्मठता के खेत
 बहाने होंगे अमूल्य स्वेद।

जूझना होगा...
अनजाने झंझावातों से 
आस को बुझाने के लिए
अचानक उठी आँधियों से
घबराकर बुझने के पहले
दृढ़ आत्मबल की हथेलियों से
 नन्हीं लौ की घेराबंदी
बचा ही लेगी 
उजाले की कोई 
 किरण।

और...
आशा के लिए जूझते समय
समय को कोसने की जगह
करना होगा पलों से संवाद 
कदाचित्...
तुम्हारी जुझारूपन की
ज्योर्तिमय गाथा
समय की कील पर टंगी
 नैराश्य की पोटली में
बंद सुबकती आत्माओं
की मृतप्राय रगो में
भर दे प्रेरणा की
संजीवनी।

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#श्वेता सिन्हा
४ जुलाई २०२१

शनिवार, 24 अप्रैल 2021

आत्मा



आत्मा को ललकारती
चीत्कारों को अनसुना
करना आसान नहीं होता ...

इन दिनों सोचने लगी हूँ
एक दिन मेरे कर्मों का
हिसाब करती
प्रकृति ने पूछा कि-
महामारी के भयावह समय में
तुम्हें बचाये रखा मैंने
तुमने हृदयविदारक, करूण पुकारों,
साँसों के लिए तड़प-तड़पकर मरते
बेबसों जरूरतमंदों की 
क्या सहायता की?

मैं कहूँगी-

एक सभ्य और समझदार 
जिम्मेदार नागरिक की तरह,
महामारी से बचने के लिए
निर्गत दिशानिर्देशों का
अक्षरशः पालन किया।

अपनों को खोने को विवश
शोकाकुल,
घुटती साँस,तड़पती देह लिए
छटपटाते,लाचारों को
महामारी का ग्रास बनते 
देखकर आह भरती रही।

घटते-बढ़ते आँकड़ों का
सूक्ष्म विश्लेषण करती
सत्ताधीशों की मतलबपरस्ती 
व्यवस्थाओं की नाकामयाबी को
 खूब कोसती रही ।

मैंने सकारात्मक कविता लिखी
उत्साहवर्धक भूमिकाएँ लिखीं
मेरा प्रलाप सुनकर
प्रकृति ठठाकर हँस पड़ेगी
और मैं...
अपनी अकर्मण्यता को 
आवरणहीन देखकर
लज्जा से 
 फूट-फूटकर रो पडूँगी
तब प्रकृति मुझे 
मुट्ठीभर रेत बनाकर
मरूस्थल में बिखेर देगी।
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#श्वेता सिन्हा
अप्रैल २०२१


रविवार, 18 अप्रैल 2021

वक़्त के अजायबघर में

वक़्त के अजायबघर में
अतीत और वर्तमान 
प्रदर्शनी में साथ लगाये गये हैं-

ऐसे वक़्त में
जब नब्ज़ ज़िंदगी की
टटोलने पर मिलती नहीं,

साँसें डरी-सहमी
हादसों की तमाशबीन-सी
दर्शक दीर्घा में टिकती नहीं,

ज़िंदगी का हर स्वाद
खारेपन में तबदील होने लगा
मुस्कान होंठो पर दिखती नहीं,

नींद के इंतज़ार में
करवट बदलते सपने 
रात सुकून से कटती नहीं,

पर फिर भी  कभी किसी दिन
 ऐसे वक़्त में...

चौराहे पर खड़ा वक़्त
राह भटका मुसाफ़िर-सा,
रात ज़िंदगी की अंधेरों में
भोर की किरणें टटोल ही लेगा...,

वक़्त के पिंजरे में
बेबस छटपटाते हालात
उड़ान की हसरत में
फड़फड़ाकर पंख खोल ही लेगें...,

मरूस्थली सुरंग के
दूसरी छोर की यात्रा में
हाँफते ऊँटों पर लदा,बोझिल दर्द
मुस्कुराकर बोल ही पड़ेगा...,

उदासियों के कबाड़
शोकगीतों के ढेर पर चढ़कर
ऐ ज़िंदगी! तेरी इक आहट 
उम्मीदों की चिटकनी खोल ही देगी...।

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#श्वेता सिन्हा
 १७ अप्रैल २०२१


 

मैं से मोक्ष...बुद्ध

मैं  नित्य सुनती हूँ कराह वृद्धों और रोगियों की, निरंतर देखती हूँ अनगिनत जलती चिताएँ परंतु नहीं होता  मेरा हृदयपरिवर...