मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018

पलाश


पिघल रही सर्दियाँ
झर रहे वृक्षों के पात
निर्जन वन के दामन में
खिलने लगे पलाश

सुंदरता बिखरी फाग की
चटख रंग उतरे घर आँगन
लहराई चली नशीली बयार
लदे वृक्ष भरे फूल पलाश

सिंदूरी रंग साँझ की
मल गये नरम कपोल
तन सजे रेशमी चुनर-सी
केसरी फूल पलाश

आमों की डाली पे गाये
कोयलिया विरहा राग
अकुलाहट हिय पीर उठे
हृदय फूटे फूल पलाश

गंधहीन पुष्पों की बहारें
मृत अनुभूति के वन में
दावानल सा भ्रमित होता
मन छलने लगे पलाश

       -- श्वेता सिन्हा



मैं से मोक्ष...बुद्ध

मैं  नित्य सुनती हूँ कराह वृद्धों और रोगियों की, निरंतर देखती हूँ अनगिनत जलती चिताएँ परंतु नहीं होता  मेरा हृदयपरिवर...