Tuesday, 31 March 2026

युद्ध और चिड़िया


 अबके फागुन 
टेसू नहीं खिले
बेरंग, उदास जंगलों 
में पत्तों के बिछावन
संगीनों की नोंक से रक्तरंजित 
मासूमों के दर्द सहला रहे हैं...।
पतझड़ में टूटे 
ज़िंदगी की शाखाओं से
वसंत आने के बाद 
नये पत्ते फिर से मुस्काऍंगे
पर सैनिकों की कराहों 
से बेचैन, डरी, अन्यमनस्क 
बारूद की गंध से छटपटाती
तितलियों,फूलों, गौरेया के 
हृदय में वसंत रंग नहीं भर पाते हैं...
हवाओं में बढ़ती नफरत की
मात्राओं को सोखने में असमर्थ 
घबराई चिड़िया नहीं जानती
युद्ध किसलिए है...
शत्रु और मित्र की परिभाषाओं से अनभिज्ञ,
सही-गलत की सीमाओं से परे,
मृत सैनिकों की ऑंखों से
कुछ सपने चुनकर 
उनके घर-आंगन में बो रही हैं
ताकि युद्ध खत्म  होने के बाद
बंजर हुई धरती की दुर्दशा पर
रोते चातक की ऑंसुओं की नमी से
जब फूटेंगे 
कुछ रंग और ख़ुशबू से भरे
 हरे-भरे पेड़
उनकी डालियों में वो
फुदक-फुदक कर गा सकेगी
फिर से प्रेम और करुणा से भरी 
जीवन की पवित्र प्रार्थनाऍं...। 


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-श्वेता
३१ मार्च२०२६
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Saturday, 14 February 2026

तुम जैसे...


तुम जैसे...

स्वप्न ,स्फुरण

साक्षात मायावी लोक

कल्पनाओं में कामधेनु

चुंबकीय इच्छाओं से 

सुवासित इंद्रलोक।


तुम जैसे....

छुप-छुपकर भागकर

देहरी पार,

स्वाद लेती टिकोरे

और होंठ पर 

उभर आये अपरस।


तुम जैसे...

ग्रीष्म की बेचैन रातों में

कच्ची नींद में सोई कोयल के 

स्वप्नों में अंजुरी भर

बसंत की स्मृति।


तुम जैसे...

बंद पलकों की खिड़की पर

डोलता जुगनू,

अंधेरे की उंगली में जड़ा

 नीला रत्न,

अथाह जल के बीच

घड़ियाल के पीठ पर बैठकर

उकेरे गये सपने,

अंतिम इच्छा का उत्सव। 

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-श्वेता

१४ फरवरी '२६'





Monday, 26 January 2026

एक त्योहार....

(१)
सत्तहत्तर वर्षों से
ठिठुरता गणतंत्र
पदचापों की
गरमाहट से
जागकर
कोहरे में लिपटा
राजपथ
पर कुनमुनाता है।

गवाह 
प्राचीर लालकिला
देश की सुख-समृद्धि
वैभवपूर्ण,संपूर्ण
शौर्य गाथा
अतिथियों की 
करतल ध्वनियों पर
गर्व से लहराता तिरंगा 
राजा दर्प से
और इतराता है।

झाँकियाँ रंगबिरंगी
प्रदेशों और विभागों की
सांस्कृतिक उपलब्धियाँ
 गिनवाती
नाचते-गाते 
आदमकद पुतले,
कठपुतली सरीखे 
पात्रों के साथ
मिलकर रचाते है
मनोरंजक नाटक
समझदार दर्शक 
समय समाप्ति की
प्रतीक्षा में अधीर
कृत्रिम मुसकान 
चिपकाये अलसाता है।
हमारा समृद्ध,गौरवशाली
पारंपरिक गणतंत्र
ऐसे ही मनाया जाता है।

(२)
सोच रही हू्ँ
एक दिवस और;
उत्साह और उमंग से
परिपूर्ण
राजपथ पर
सजना चाहिये
जनतंत्र दिवस के नाम
झूठी,शान बघारती,
उपलब्धियाँ
महज आँकड़े 
गिनवाने की भीड़ 
की नहीं
प्रादेशिक,आँचलिक
सामाजिक कुरीतियों,
कमियों की, 
जन हितों की 
अनदेखी की
सच्ची झाँकियाँ, 
आत्ममंथन,
कार्यावलोकन को
प्रेरित करती,
कराहते पीड़ित,वंचितों 
के लिए खुशियाँ मनाने का
कोई एक दिन तो हो
महज 
आशाओं के पंख
पर सवार
दिवास्वप्न मात्र नहीं
औपचारिकता,कृत्रिमता
से परे
जन के मन का
राष्ट्र का सत्य से 
साक्षात्कार का दिवस
एक त्योहार
ऐसा भी होना ही चाहिए।
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#श्वेता सिन्हा

मैं से मोक्ष...बुद्ध

मैं  नित्य सुनती हूँ कराह वृद्धों और रोगियों की, निरंतर देखती हूँ अनगिनत जलती चिताएँ परंतु नहीं होता  मेरा हृदयपरिवर...