अनुभव
पिछले छः दिनों से ऐसा लग रहा है कि मैं किसी मरघट
के प्रतीक्षालय में बैठी हूॅं। तीव्र होती मृत्यु की गंध धीरे-धीरे मन पर एक संवेदनहीनता का परत चढ़ा रही है।
अपने पापा की सबसे दुलारी, कोमल हृदय बेटी आज अस्पताल के CCU के बाहर प्रतीक्षा कक्ष में बैठी उनकी
अंतिम सॉंसे गिन रही है।
पिछले छ: दिनों से दिन-दिनभर भरी ऑंखों से टकटकी बांधे CCU वार्ड के दरवाज़े को खुलते-बंद होते देखते रहते हैं इस उम्मीद से कि शायद पापा ऑंख खोलेंगे,कुछ शब्द आंखों से ही कहेंगे,एक बार हमको नज़रभर देख लेंगे, पर आज सारी आशाएं टूट गयी, सुबह डॉक्टर ने बुलाकर कह दिया आज का दिन वो पूरा नहीं कर पायेंगे। चुपचाप अपने पति का हाथ थामें प्रतीक्षालय की बेंच पर बैठ गये।
पापा जा रहे हैं हमेशा -हमेशा के लिए ये एहसास सिर्फ आंसू बनकर छाती को बींध नहीं रहे बल्कि मुझे स्मृतियों के भंवर में खींचने लगे। सारा दिन पापा की अनगिनत बातें,उनकी यादें दिल-दिमाग से लगाए बस सोचती रही
और रात को अस्पताल से वापस लौटकर थोड़ा सा लेटी ही थी किCCU से फोन आ गया कि "आ जाइये"।
पापा चले गये...
आधी रात को जब पापा को बर्फ़ पर लिटाकर लौटे तो मन
उन्हीं के पास मंडरा रहा था कैसे रात बीती कब सुबह हुई कुछ पता नहीं चला।
सुबह-सुबह अस्पताल की सारी प्रक्रिया पूरी कर पापा को लेकर घर आने के बाद मॉं को रोता-बिलखता,तड़पता,कलपता देखना, उनका दर्द महसूस करना शब्दों में बयान कर पाना मुश्किल है।
हम तीन बहन ही हैं । मेरे पापा पिछले कुछ साल से ये कहते थे कि मेरे जाने के बाद मेरे लिए कौन करेगा तब हम हमेशा कहते पापा आप चिंता क्यों करते हैं हम हैं न.... बोलकर उनको डॉंट भी देते थे कि आप क्यों फालतू बात सोचते हैं।
हम अपना कहा पूरा किये पापा...
निष्प्राण पड़े पापा को देखना, पापा की अंतिम यात्रा के पहले पंडित जी के कहे अनुसार और श्मशान पहुंचने बाद की सारी प्रक्रिया यंत्रवत करके घर लौटे तो चौखट के इस पार और उस पार की दुनिया का अंतर स्पष्टता से उभर गया। इस यात्रा में पुरूषों के बीच घिरी इकलौती स्त्री के मन के शोकाकुल भाव स्वयं स्थिर हो गये। पुरूष स्त्रियों की तरह अपने मन पर बहुत देर तक दुख हावी नहीं होने देते जल्दी ही सहज हो जाते हैं।
एक संतान से माता-पिता की जो अपेक्षा होती है वो हम पूरा किये ऐसा सब कह रहे। बाकी बचे सारे कर्म कांड नियमानुसार पालनकर,पूरी श्रद्धा और प्यार से अपने पापा की इच्छानुसार रीति-रिवाज सबकुछ निभाए।
आज बीस दिन हो गये आपको गये पापा...
कर्म कांड के बहुत सारे नियम के दिनों के अनुभव हमें अध्यात्म से जोड़ते हैं देह ,जीवन, संसार और कर्म का महत्व समझाते हैं।
लिखना तो बहुत कुछ है पर शायद भाव हावी है मन पर।
समय जब घाव भरने लगेगा तो शायद
कुछ और साझा कर पाए...।
सबकुछ जानने -समझने के बावजूद मेरे मन के कोने में दबी पीड़ा रह-रह कर व्यथित कर रही है। अस्पताल से लेकर श्मशान और घाट तक के सारे दृश्य फुरसत पाकर दबोच लेते हैं अचानक से सोते से जाग जाते हैं रात-रातभर
जागते रहते हैं ,ऑंसू पलकों पर रूके हुए हैं मानो।
पापा आपकी बहुत याद आती है। आपसे बातें करने का बहुत मन होता है। बिना कुछ कहे-सुने अचानक आपका चले जाना बहुत कचोट रहा है पापा।
काश कि फिर एक आप गले लगाकर सर पर हाथ रख देते पापा...।
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-श्वेता

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आपकी लिखी प्रतिक्रियाएँ मेरी लेखनी की ऊर्जा है।
शुक्रिया।