शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

सैनिक


हरी-भूरी छापेवाली
वर्दियों में जँचता
कठोर प्रशिक्षण से बना
लोहे के जिस्म में
धड़कता दिल,
सरहद की बंकरों में
प्रतीक्षा करता होगा
मेंहदी की सुगंध में 
लिपटे कागज़ों की,
शब्द-शब्द
बौराये एहसासों की
अंतर्देशीय, लिफ़ाफ़ों की।

उंगलियां छूती होंगी रह-रहकर
माँ की हाथों से बँधी ताबीज़ को, 
बटुए में लगी फोटुओं 
से बात करती आँखें
करवट लेते मौसम की अठखेलियाँ,
हवाओं,बादलों,चाँद से टूटकर छिटके 
चाँदनी की मोतियों,रंग बदलते
पहाड़ों,वादियों,सुबह और साँझों
से तन्हाई में गुफ्तगूं करते 
मन ही मन मुस्कुराकर 
कहते होंगे जरूर-

संगीनों पर सजा रखी है पोटली
याद की चिट्ठियों वाली
आँखों में बसा रखी है ज़िंदगी 
मौत की अर्जियों वाली।

#श्वेता सिन्हा
१५ जनवरी २०२१

सोमवार, 11 जनवरी 2021

चमड़ी के रंग


पूछना है अंतर्मन से
चमड़ी के रंग के लिए
निर्धारित मापदंड का
शाब्दिक
 विरोधी
हैंं हम भी शायद...?

आँखों के नाखून से
चमड़ी खुरचने के बाद
बहती चिपचिपी नदी का
रंग श्वेत है या अश्वेत...? 
नस्लों के आधार पर
मनुष्य की परिभाषा
तय करते श्रेष्ठता के
 
खोखले आवरण में बंद
घोंघों को 
अपनी आत्मा की प्रतिध्वनि 
भ्रामक लगती होगी...।

सारे लिज़लिज़े भाव जोड़कर 
शब्दों की टूटी बैसाखी से
त्वचा के रंग का विश्लेषण
वैचारिकी अपंगता है या 
निर्धारित मापदंड के
संक्रमण से उत्पन्न
मनुष्यों में पशुता से भी
निम्नतर,पूर्वाग्रह के 
विकसित लक्षण वाले
असाध्य रोग  ?

पृथ्वी के आकार के
ग्लोब में खींची
रंग-बिरंगी, टेढ़ी-मेढ़ी
असमान रेखाओं के
द्वारा निर्मित
विश्व के मानचित्र सहज
स्वीकारते मनुष्य का
पर्यावरण एवं जलवायु
के आधार पर उत्पन्न
चमड़ी के रंग पर 
नासमझी से मुँह फेरना
वैचारिक एवं व्यवहारिक 
क्षुद्रता का
ग्लोबलाइजेशन है शायद...।

#श्वेता सिन्हा
११ जनवरी २०२१

मैं से मोक्ष...बुद्ध

मैं  नित्य सुनती हूँ कराह वृद्धों और रोगियों की, निरंतर देखती हूँ अनगिनत जलती चिताएँ परंतु नहीं होता  मेरा हृदयपरिवर...