तुम जैसे...
स्वप्न ,स्फुरण
साक्षात मायावी लोक
कल्पनाओं में कामधेनु
चुंबकीय इच्छाओं से
सुवासित इंद्रलोक।
तुम जैसे....
छुप-छुपकर भागकर
देहरी पार,
स्वाद लेती टिकोरे
और होंठ पर
उभर आये अपरस।
तुम जैसे...
ग्रीष्म की बेचैन रातों में
कच्ची नींद में सोई कोयल के
स्वप्नों में अंजुरी भर
बसंत की स्मृति।
तुम जैसे...
बंद पलकों की खिड़की पर
डोलता जुगनू,
अंधेरे की उंगली में जड़ा
नीला रत्न,
अथाह जल के बीच
घड़ियाल के पीठ पर बैठकर
उकेरे गये सपने,
अंतिम इच्छा का उत्सव।
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-श्वेता
१४ फरवरी '२६'
