तुम्हारी मुट्ठियों में ज़कड़ा हुआ ग़ुस्सा,
माथे पर तनी हुई ये बेबस सिलवटें,
और आँखों में दहकते भविष्य के सवाल-
अनदेखा करना अब आसान नहीं...
डिग्रियों को मोमबत्ती बनाकर
उजले भविष्य के स्वप्न बुनने वाले
अॕंधेरा छँटने की बजाय और घना हो रहा है
तुम हार से नहीं,
बार-बार छले जाने से आक्रोशित हो।
तुम थक चुके हो
उम्मीदों के उन खोखले विज्ञापनों से,
जो हर सुबह तुम्हारे किवाड़ पर
झूठे वादों का पिटारा छोड़ जाते हैं।
लेकिन सुनो,
यह आक्रोश जो तुम्हारी रगों में उबाल मार रहा है,
कोई अभिशाप नहीं,
तुम्हारी बची हुई जिजीविषा का प्रमाण है।
यह प्रमाण है कि तुम अभी मरे नहीं हो,
तुम व्यवस्था की खामोश बेड़ियों को
स्वीकारने से इंकार करते हो।
पर इस आग को
केवल राख बन जाने के लिए मत जलने दो।
ग़ुस्सा जब तक सिर्फ़ चीख बनकर सड़कों पर बिखरता है,
शासक की दीवारें और ऊँची हो जाती हैं।
पर यही आक्रोश
जब संकल्प का रूप लेता है,
जब यह दीवारों पर सिर पटकने के बजाय
दरवाज़े बनाने का हुनर सीखता है—
तब इतिहास रास्ता छोड़ देता है।
तोड़ो मत अपने ही हाथों से बनाया हुआ शहर,
यह देश, यह हवा, यह कल—सब तुम्हारा ही तो है।
पत्थर उठाने से ज़्यादा ताक़त
उन पत्थरों को तराशकर
एक खिड़की बनाने में है
जो अंधेरे को चीरकर अपना उजाला ख़ुद छीन लेती है।
ज़रा ठहरो,
साँस लो,
और अपने इस उबलते हुए ख़ून को
दिशा दो।
तुम सिर्फ़ इस दौर की हताशा नहीं हो,
तुम आज की लंबी, काली, घुटनभरी रात नहीं
तुम आने वाले कल की सबसे
ख़ूबसूरत सुबह हो।
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-श्वेता
