मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

विस्मृति ...#मन#

मन पर मढ़ी
ख़्यालों की जिल्द
स्मृतियों की उंगलियों के
छूते ही नयी हो जाती है,
डायरी के पन्नों पर 
जहाँ-तहाँ
बेख़्याली में लिखे गये
आधे-पूरे नाम 
पढ़-पढ़कर ख़्वाब बुनती
अधपकी नींद, 
एहसास की खुशबू से
छटपटायी बेसुध-सी
मतायी तितलियों की तरह
 जम चुके झील के 
 एकांत तट पर
उग आती हैं कंटीली उदासियाँ
सतह के भीतर
तड़पती मछलियों को
प्यास की तृप्ति के लिए
चाहिए ओकभर जल।

तारों की उनींदी
उबासियों से
आसमान का
बुझा-सा लगना,
मछलियों का
बतियाना,
पक्षियों का मौन 
होना,
उजाले से चुधियाईं आखों से
अंधेरे में देखने का
अनर्गल प्रयास करना,
बिना माप डिग्री के 
अक्षांश-देशांतर के
चुम्बकीय वलय में
अवश 
मन की धुरी के
इर्द-गिर्द निरंतर परिक्रमा
करते ग्रहों को निगलते 
क्षणिक ग्रहण
की तरह
प्रेम में विस्मृति
भ्रम है।

#श्वेता


बुधवार, 16 दिसंबर 2020

'अजूबा' किसान

चित्र:मनस्वी

सदियों से एक छवि
बनायी गयी है,
चलचित्र हो या कहानियां
हाथ जोड़े,मरियल, मजबूर
ज़मींदारों की चौखट पर 
मिमयाते,भूख से संघर्षरत
किसानों के रेखाचित्र...
और सहानुभूति जताते दर्शक  
अन्नदाताओं को
बेचारा-सा देखना की
आदत हो गयी है शायद...!!

अपनी खेत का समृद्ध मालिक
पढ़ा-लिखा,जागरूक,
आधुनिक विचारों से युक्त,
जींस पहने, स्मार्ट फोन टपटपाता
मुखरित, बेबाक,
नयी जानकारियों से अप-टू-डेट
किसान नौटंकी क्यों लगता है?

गाँवों से समृद्ध हमारा देश 
 शहर से स्मार्ट शहर में बदला,
 स्मार्ट शहर से
 मेट्रो सिटी के पायदान चढ़ने पर
हम गर्वित हैं,
ग्रहों-उपग्रहों का शतकीय लॉचिंग,
5 जी,हाई स्पीड अंतरजाल
की बातें करते,
आधुनिक ,अत्याधुनिक और
 सुविधासंपन्न
होना उपलब्धि है,
फिर किसान का
काजू-बादाम,पिज्जा खाना
रोटी की मशीन और
टैक्टर से सज्जित,
बड़ी गाड़ियों से आना
अटपटा क्यों लगता है?

समाज का कौन-सा तबका 
सब्सिडी या सरकारी योजनाओं का
लाभ छोड़ देता है? 
बैंक का इंटरेस्ट रेट कम ज्यादा होने पर
सरकार को नहीं गरियाता है?
आयकर कम देना पड़े
अनगिनत तिकड़म नहीं लगाता है? 
अपनी समझ के हिसाब से
संवैधानिक अधिकारों की पीपुड़ी
कौन नहीं बजाता है?

क्रांति,आंदोलन या विद्रोह
सभी प्रकार के संघर्ष 
करने वालों का चेहरा तो
एक समान तना हुआ,
आक्रोशित ही होता है!
हर प्रसंग में
राजनीतिक दखलंदाजी
पक्ष-विपक्ष का खेल
नेताओं ,अभिनेताओं की
मौकापरस्ती
बहती गंगा में डुबकी लगाना
कोई नयी बात तो नहीं...!!

वैचारिकी पेंसिलों को 
अपने-अपने
दल,वाद,पंथ के
रेजमाल पर घिसकर
नुकीला बनाने की कला 
 प्रचलन में है,
सुलेख लिखकर
सर्वश्रेष्ठ अंक पाने की
होड़ में शामिल होने वाले
दोमुँहे बुद्धिजीवियों से
किसी विषय पर
निष्पक्ष मूल्यांकन 
और मार्गदर्शन की आशा
हास्यास्पद है।

तो फिर
 साहेब!!
एक बार
विरोध और समर्थन
पक्ष-विपक्ष का 
चश्मा उतारकर,निष्पक्ष हो
सोचिये न ज़रा...
याचकीय मुद्राओं को त्यागकर
मुनादियों से असहमत
अपने हक़ की बात पर
धरना-प्रदर्शन, विरोध करता 
बरसों से प्रदर्शनी में लगी
अपनी नैराश्य की तस्वीरें
चौराहों से उतारकर
अपनी दयनीय छवियों को
स्वयं तोड़ता,
अपने सपनों को ज़िदा रखने के लिए
अपनी बात ख़ुद फरियाने 
एकजुट हुआ किसान
  'अजूबा'
 क्यों नज़र आता है??

#श्वेता सिन्हा


 

शनिवार, 12 दिसंबर 2020

पहले जैसा


कोहरे की रजाई में
लिपटा दिसंबर,
जमते पहाड़ों पर
सर्दियाँ तो हैं
पर, पहले जैसी नहीं...।

कोयल की पुकार पर
उतरता है बसंत 
आम की फुनगी से
मनचले भौंरे महुआ पीकर
फूलों को छेड़ते तो हैं
पर, पहले जैसा नहीं...।

पसीने से लथपथ,
धूप से झुलसता बदन
गुलमोहर की छाँव देख
सुकून पाता तो है
पर,पहले जैसा नहीं...।

घुमड़ते बादलों की धुन पर
मोर नाचते हैं
बूँदों का अमृत चक्ख
बीज अँखुआते हैं
बारिशें लुभाती तो हैं 
पर, पहले जैसी नहीं...।

मौसम बदलते  हैं
कैंलेडर की तिथियों के साथ
सर्दी, गर्मी,बारिश बसंत,पतझड़
वर्ष उतरते हैं समय की रथ से
धरती का शृंगार करने
स्मृतियों में कैद ऋतुएँ
पर कभी लौटकर
पहले जैसा नहीं आती,

बचपन,यौवन,प्रौढ़,बुढ़ापा
तन के साथ-साथ
मन की भावनाओं का आलोड़न
महसूस तो होता है,
पर स्मृतियों में कैद पल
भींच लेते हैं सम्मोहन में
फिर, उलझा मन लौटता है  
स्मृतियों के परों से वापस
असंतोष वर्तमान का
कानों में फुसफुसाता है
ज़िंदगी चल तो रही है
पर, पहले जैसी नहीं...।

पल-पल बदलते परिदृश्यों में
बीते हुए खूबसूरत क्षणों को
 फिर से उसी प्रकार जी लेने की
उत्कट तृष्णा 
अतृप्ति से स्मृतियों की गुफा में 
मुड़-मुड़कर देखती है
'पहले जैसा' की अभिलाषा में
साथ चलते पलों की अनदेखी से
उदासी और दुःख में डूब
जाती हैं उम्मीदें,
'परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है'
सोदाहरण 
जानता,समझता तो है मन
पर जाने क्यों
आत्मसात कर सत्य
'पहले जैसा' के जाल से
मुक्त क्यों न हो पाता है?

©श्वेता सिन्हा




 

बुधवार, 9 दिसंबर 2020

लय मन के स्फुरण की

पकड़ती हूँ कसकर 
उम्र की उंगलियों में
और फेंक देती हूँ 
गहरे समंदर में 
ज़िंदगी के 
जाल एक खाली 
इच्छाओं से बुनी..
तलाश में
कुछ खुशियों की।

भारी हुई-सी जाल 
 निकालती हूँ जब 
उत्सुकतावश,
आह्लाद से भर  
अक़्सर जाने क्योंकर
फिसल जाती हैं 
सारी खुशियाँ।
और .. रह जाती हैं
अटकी हथेलियों में  
दुःख में डूबी 
सच्चाईयों की
चंद किलसती मछलियाँ।

स्मृतियाँ तड़पती आँखों, 
व फूलती साँसों की 
छप-सी जाती हैं
मासूम हृदय पर।
यातना के धीपाये हुए 
सलाखों के
गहरे उदास निशां में
ठहर जाती है लय
मन के स्फुरण की।

#श्वेता सिन्हा


रविवार, 6 दिसंबर 2020

किसान


चित्र: मनस्वी प्रांजल

धान ,गेहूँ,दलहन,तिलहन
कपास के फसलों के लिए
बीज की गुणवत्ता
उचित तापमान,पानी की माप
मिट्टी के प्रकार,खाद की मात्रा
निराई,गुड़ाई या कटाई का
सही समय
मौसम और मानसून का प्रभाव
भूगोल की किताब में
पढ़ा था मैंने भी
पर गमलों में पनपते
बोनसाई की तरह जीने की
विवशता ने
सीमित कर दिया
अर्जित ज्ञान। 

मौसम की बेरुख़ी
साहूकार,
भूख, मँहगाई,
अनवरत, अनगिनत
साज़िशों से
रात-दिन लड़ते 
आत्मसम्मान गिरवी रखते
अन्नदाताओं की
अनगिनत कहानियाँ
पढ़-सुनकर निकली
आह!! 
प्रेम कथाओं से अटी
किताब की अलमारी में
नीचे दबती गयी...
तिलिस्मी, कल्पनाओं में
विचरती
अहसास की तितलियाँ
ज्यादा सुखद लगी।

आज़ादी के बाद
अनगिनत सरकारी
योजनाओं की घोषणाओं
के पश्चात भी
कृषि और कृषकों की
दयनीय दशा की तस्वीर
'बैल से ट्रैक्टर'
'साहूकार से बैंक'
मात्र इतनी ही बदली, 
मजबूर कृषकों की
मज़दूरी की विवशता,
आत्महत्या की संख्या में बढ़ोतरी,
खेतीहर भूमि पर पनपते 
विषैला धुँआ उगलते उद्योग,
बिचौलियों और पूंजीपतियों का
बढ़ता वर्चस्व
संज्ञाशून्य होकर
पढ़ती रही,देखती रही... 
देश के विकास के
कानफोड़ू नारों से
 भावनाएँ पथराकर
तटस्थता में परिवर्तित होकर
वैचारिकी उर्वरता सोख़ चुकी थी।

बदलते परिदृश्य में
अनाज़ की पोटली बाँधे
हक़ की बात पर
लाव-लश्कर के साथ
गाँव से राजधानी की ओर
कूच करते कुछ खास
प्रदेशों के समृद्ध अन्नदाता 
संगठित,ओजपूर्ण
जोशीले, जिद्दी और
सजग हैं, उनके तेवर
हाशिये पर पड़े प्रदेशों के
मरियल, मिमियाते
हालात की पहेलियों में
उलझे गरीब,मजबूर किसानों से
बिल्कुल नहीं मिलते
 एक भिन्न रूप,
सशक्त क्रांतिकारी चिंगारी
का प्रतिनिधित्व करते
अन्नदाताओं ने
बरसों से ज़मा की गयी
अत्याचार,रोष और असंतोष
से पीड़ित,शोषित ,
माटी में दफ़न इतिहास,
पुरखों के सम्मान से रिसते घावों
को पोंछकर,
कराहती आत्माओं का
प्रतिशोध लेने की ठानी है,
सारी नीतियों, रणनीतियों
का चक्रव्यूह ध्वस्तकर
ऋणमुक्त करने का
संकल्प लिया है
पूरे अधिकार से
छीनकर अपने हिस्से
की रोटियाँ,
भर-भरकर मुट्ठियों से बीज़
खलिहानों में बिखेरकर
वो सींचना चाहते हैं  
स्वस्थ अंकुरण की नयी खेप
और उगाना चाहते हैं 
न सपनें नहीं,
यथार्थ में सोना,हीरा और मोती,
अपने लिए
अपने ख़ातिर,अपनों के
सुरक्षित भविष्य की
ख़ुशहाली के लिए।

हाँ, मैं किसान नहीं हूँ
नहीं समझ सकती उनके संघर्ष,
दुरूहता या जीवटता, 
परिस्थितियों के आधार पर
अव्यवहारिक रूप से
मैंने पढ़ी और समझी है किसानी
पर फिर भी
मुझे बहुत फ़र्क़ पड़ता है
किसानों की गतिविधियों से
अपने-अपने
कर्मपथ के जुझारू पथिक
हैं हम दोनों ...  
देश का पेट भरने वाले
 किसानों की
बिरादरी से नहीं हूँ मैं
पर महसूस करती हूँ
मुझमें और उनमें है तो
अन्योन्याश्रित संबंध।

©श्वेता सिन्हा








सोमवार, 30 नवंबर 2020

चाँद

ठिठुरती रात,
झरती ओस की
चुनरी लपेटे
खटखटा रही है
बंद द्वार का
साँकल।


साँझ से ही
छत की अलगनी
से टँगा
झाँक रहा है
शीशे के झरोखे से
उदास चाँद
तन्हाई का दुशाला 
ओढ़े।


नभ के
नील आँचल से
छुप-छुपकर
झाँकता 
आँखों की
ख़्वाबभरी अधखुली
कटोरियों की
सारी अनकही चिट्ठियों की 
स्याही पीकर बौराया
बूँद-बूँद टपकता
मन के उजले पन्नों पर
धनक एहसास की 
कविताएँ रचता
 चाँद।


शांत झील की 
गोद में लहराती
चाँदनी की लटें,
पहाड़ी की बाहों में बेसुध
बादलों की टोलियाँ
वृक्षों की शाखों पर
उनींदे पक्षियों की 
सरसराहटें
हवाओं की धीमी
फुसफुसाहटें
और...
ठंड़ी रात की नीरवता के
हरपल में 
चाँद के मद्धिम
आँच में धीमे-धीमे
खदबदाती
कच्चे रंगों में
स्वप्नों की 
बेरंग चुन्नियाँ  ...।


#श्वेता सिन्हा
 
 

शनिवार, 28 नवंबर 2020

सीख क्यों न पाया?

सृष्टि के प्रारंभ से ही
ब्रह्मांड के कणों में
घुली हुई
नश्वर-अनश्वर 
कणों की संरचना के 
अनसुलझे
गूढ़ रहस्यों की
 पहेलियों की 
 अनदेखी कर
ज्ञान-विज्ञान,
तर्कों के हवाले से
मनुष्य सीख गया
परिवर्तित करना
कर्म एवं मानसिकता 
सुविधानुसार
आवश्यकता एवं
परिस्थितियों का
राग अलापकर।

भोर की तरह
धूप का अंश होकर,
बादल या आकाश
की तरह,
चंदा-तारों की तरह
रात और चाँदनी की
गवाही पर
जीवन का स्पंदन
महसूसना
कण-कण में
दृश्य-अदृश्य रूप में
संलिप्त, 
खोकर अस्तित्व 
स्व का
निरंतर कर्मण्य,
 निर्लिप्त होना
सृष्टि के रेशों में बंधी
प्रकृति की तरह ...
प्रकृति का सूक्ष्म अंश
है मानव
फिर भी...
सीख क्यों न पाया
प्रकृति की तरह
निःस्वार्थ,
निष्कलुष एवं
निष्काम होना?

#श्वेता


गुरुवार, 26 नवंबर 2020

डर

मुझे डर नहीं लगता
त्रासदी के घावों से
कराहती,ढुलमुलाती
चुपचाप निगलती
समय की
खौफ़नाक भूख से।


मुझे डर नहीं लगता
कफ़न लेकर
चल रही हवाओं के
दस्तक से खड़खड़ाते
साँकल के
भयावह पैगाम से।


मुझे डर नहीं लगता
आग को
उजाला समझकर
भ्रमित सुबह की
उम्मीद के लिए 
टकटकी बाँधे
निरंतर जागती 
जिजीविषा से।


मुझे डर नहीं लगता
क्योंकि 
अंर्तमन को
अनसुना करना,
बात-बात पर चुप्पी साधना
मज़लूमों की सिसकियों को
परे धकियाना
जीने के लिए तटस्थ होना
सीख लिया है।


पर जाने क्यों
बहुत डर लग रहा है...
नफ़रत और उन्माद
का रस पीकर मतायी
लाल नरभक्षी चींटियों
के द्वारा
मानव बस्तियों की
घेराबंदी से।

✍️ श्वेता सिन्हा



गुरुवार, 5 नवंबर 2020

धर्म


(१)

कर्तव्य, सद् आचरण,अहिंसा
मानवता,दया,क्षमा
सत्य, न्याय जैसे

'धारण करने योग्य'
'धर्म' का शाब्दिक अर्थ
हिंदू या मुसलमान 
कैसे हो सकता है?


विभिन्न सम्प्रदायों के समूह,
विचारधाराओं की विविधता
संकीर्ण मानसिकता वाले
 शब्दार्थ से बदलकर
मानव को मनुष्यता का 
पाठ भुलाकर
 स्व के वृत में घेरनेवाला
'धर्म' कैसे हो सकता है?


कोमल शाखाओं के
पुल बनने की प्रक्रिया में 
संक्रमित होकर
संवाद के विषाक्त जल में 
गलकर विवाद के
दलदल में सहजता से
बिच्छू बन जाना
धर्म कैसे हो सकता है?


सभ्यता की
विकास यात्रा में
 बर्बर होती संवेदना की
 अनदेखी कर
 उन्मादित शिलापट्टीय 
परंपरा वहन करना
धर्म कैसे हो सकता है?


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(२)

धर्म की परिभाषा
गढ़ने की यात्रा में
शताब्दियों से सींची जा रही
रक्तपोषित नींव 
अभेद्य दीवार खड़ी कर चुकी है
आदमी और आदमियत के मध्य।
और...
वाचाल कूपमंडूकों के 
एडियों से कुचलकर
वध कर डाले गये
मानवीय गुणों के शव एवं
गर्दयुक्त दृष्टिकोण से प्रदूषित हो
तिल-तिल मरती
संभावनाओं की दुर्दशा पर
 धर्म स्तब्ध है!!


#श्वेता
५नवंबर२०२०

शनिवार, 31 अक्तूबर 2020

सोचती हूँ...

 
२७ जून २०१८ को आकाशवाणी जमशेदपुर के कार्यक्रम सुवर्ण रेखा में पहली बार  एकल काव्य पाठ प्रसारित की गयी थी। जिसकी रिकार्डिंग २२ जून २०१८ को की गयी थी।
 बहुत रोमांचक और सुखद अवसर था। अति उत्साहित महसूस कर रही थी,
मानो कुछ बहुमूल्य प्राप्त हो गया हो
उसी कार्यक्रम में मेरे द्वारा पढ़ी गयी
 एक कविता 
--–///----

सोचती हूँ..
----
बित्तेभर विचारों का पुलिंदा और 
एक पुलकती क़लम लेकर
सोचने लगी थी
लिखकर पन्नों पर 
क्रांति ला सकती हूँ युगान्तकारी
पलट सकती हूँ
मनुष्य के मन के भाव
प्रकृति को प्रेमी-सा आलिंगन कर
जगा सकती हूँ 
बोझिल हवा,
सिसकते फूल,
घायल वन,
दुहाते पहाड़ों और
रोती नदियों के प्रति संवेदना
पर,
सहृदयताओं की कविताएँ लिखने पर भी तो
न मिटा सकी मैं
निर्धन की भूख
अशिक्षा का अंधकार
मनुष्य की पाश्विकता
मन की अज्ञानता
ईष्या-द्वेष,लोलुपता
नारियों का अभिशाप
हाँ शायद...
कविताओं को पढ़ने से
परिवर्तित नहीं होता अंतर्मन 
विचारों का अभेद्य कवच
कुछ पल शब्दों के 
ओज से प्रकाशित होती है
विचारों की दीप्ति
चंद्रमा की तरह
सूर्य की उधार ली गयी रोशनी-सी
फिर आहिस्ता-आहिस्ता 
घटकर लुप्त हो जाती है
अमावस की तरह

सोचती हूँ...
श्वेत पन्नों को काले रंगना छोड़
फेंक कर कलम थामनी होगी मशाल
जलानी होगी आस की आग 
जिसके प्रकाश में
मिटा सकूँ नाउम्मीदी और
कुरीतियों के अंधकार
काट सकूँ बेड़ियाँ 
साम्प्रदायिकता की साँकल में
जकड़ी असहाय समाज की
लौटा पाऊँ मुस्कान
रोते-बिलखते बचपन को
काश!मैं ला पाऊँ सूरज को 
खींचकर आसमां से
और भर सकूँ मुट्ठीभर उजाला
धरा के किसी स्याह कोने में।

--श्वेता सिन्हा

शनिवार, 18 जुलाई 2020

तुम्हारे जन्मदिन पर


मैं नहीं सुनाना चाहती तुम्हें
दादी-नानी ,पुरखिन या समकालीन
स्त्रियों की कुंठाओं की कहानियां,
गर्भ में मार डाली गयी
भ्रूणों की सिसकियाँ
स्त्रियों के प्रति असम्मानजनक व्यवहार
समाज के दृष्टिकोण में
स्त्री-पुरूष का तुलनात्मक
मापदंड।

मैं नहीं भरना चाहती
तुम्हारे हृदय में
जाति,धर्म का पाखंड
आडंबरयुक्त परंपराओं की
कलुषिता 
घृणा,द्वेष,ईष्या जैसे
मानवीय अवगुण
एवं अन्य
सामाजिक विद्रूपताएं।

मैं बाँधना चाहती हूँ तुम्हारी
नाजुक उम्र की सपनीली
ओढ़नी में...
अंधेरे के कोर पर 
मुस्काती भोर की सुनहरी
किरणों का गुच्छा,
सुवासित हवाओं का झकोरा,
कुछ खूशबू से भरे फूलों के बाग
नभ का सबसे सुरक्षित टुकड़ा,
बादलों एवं सघन पेड़ों की छाँव,
चिड़ियों की मासूम,
बेपरवाह किलकारियाँ,
मुट्ठीभर सितारे,
सकोरा भर चाँदनी,
चाँद का सिरहाना,
सारंगी की धुन में झूमते
थार के ऊँट और 
बाँधनी के खिले रंग,
समुंदर की लहरों का संयम
शंख और सीपियाँ 
प्रकृति के शाश्वत उपहारों
से रंगना चाहती हूँ
तुम्हारे कच्चे सपनों के कोरे पृष्ठ
ताकि तुम्हारा कोमल हृदय
बिना आघात  समझ सके
जीवन सुंदरता,कोमलता और
विस्मयकारी विसंगतियों से युक्त
गूढ़ जटिलताओं का मिश्रण है।

भौतिक सुख-सुविधाओं से 
समृद्ध कर तुम्हें
सुखद कल्पनाओं का हिंडोला
दे तो सकती हूँ
किंतु मैं देना चाहती हूँ
सामान्य व्यवहारिक प्रश्न पत्र 
जिसे सुलझाते समय 
तुम जान सको
रिश्तों का गझिन गणित 
यथार्थ के मेल 
 की रासायनिक प्रतिक्रियाएँ
भावनाओं का भौतिकीय परिवर्तन
स्नेह के काव्यात्मक छंद
तर्क के आधार पर 
विकसित कर सको
सारे अनुभव जो तुम्हारी
क्षमताओं को सुदृढ कर
संघर्षों से जूझने के
योग्य बनाये।

सुनो बिटुआ,
सदैव की तरह
आज भी मैं दे न पायी तुम्हें
तुम्हारे जन्मदिन पर
कोई भी ऐसा उपहार
जो मेरा हृदय संतोष से भर सके
किंतु मुझे विश्वास है मैंने जो
बीज रोपे हैं तुम्हारे मन की
उर्वर क्यारी में उसपर
फूटेंग मानवीय गुणों के
पराग से लिपटे
 सुवासित पुष्प, 
मेरे आशीष 
मेरे अंतर्मन की
 शुभ प्रार्थनाओं और
कर्म की ज्योति 
प्रतिबिंबित  होकर  
पथ-प्रदर्शक बनकर 
आजीवन तुम्हारे
 साथ रहेंगे। 

©श्वेता सिन्हा
१८जुलाई२०२०

बुधवार, 15 जुलाई 2020

नैतिकता


उज्जवल चरित्र उदाहरणार्थ
जिन्हें लगाया गया था
सजावटी पुतलों की भाँति
पारदर्शी दीवारों के भीतर
लोगों के संपर्क से दूर
प्रदर्शनी में
पुरखों की बेशकीमती धरोहर की तरह,
ताकि ,विश्वास और श्रद्धा से नत रहे शीश,
किंतु सत्य की आँच से
दरके भारी शीशों से
बड़े-बड़े बुलबुले स्वार्थपरता के
ईमान के लचीलेपन पर 
अट्टहास कर
कर्म की दुर्बलता का
प्रमाण देने लगे।

असंतोष और विरोध,
प्रश्नों के बौछारों से
बौखलाकर,
आँखों से दूर सँकरे कोने में 
स्थानांतरित कर दी गयी 
चौराहे पर लगी
शिकायत पेटी
और...
एक हवन कुंड बना दिया गया
लोककल्याणकारी 
पवित्र यज्ञ का हवाला देकर
आह्वान कर 
सुखद स्वप्नों के
कुछ तर्कशील मंत्र पढ़े गये
किंतु
नवीन कुछ नहीं था
समिधाएँ बनी एक बार फिर
नैतिकता।

चुपचाप रहकर
अपने मंतव्यों के पतंग
कल्पनाओं के आसमान में ही
उड़ाना सुरक्षित है,
मनोनुकूल परिस्थितियाँ
बताने वाली
समयानुकूल घड़ियाँ
प्रचलन में हैं आजकल
चुप्पियों की मुर्दा कलाईयों में
बँधी सूईयों की टिक-टिक
ईनाम है 
निर्वासित आत्मा की 
समझदार देह के लिए।

#श्वेता सिन्हा
१५ जुलाई२०२०


रविवार, 12 जुलाई 2020

शांति



विश्व की प्राचीन 
एवं आधुनिक सभ्यताओं,
पुरातन एवं नवीन धर्मग्रंथों में,
पिछले हज़ारों वर्षों के 
इतिहास की किताबों में,
पिरामिड,मीनारों,कब्रों,
पुरातात्त्विक अवशेषों 
के साक्ष्यों में,
मानवता और धर्म की 
स्थापना के लिए,
कभी वर्चस्व और 
अनाधिकार आधिपत्य की
क्षुधा तृप्ति के लिए,
किये गये संहार एवं
युद्धों के विवरण से रंगे
रक्तिम पृष्ठों में  
श्लोको, ऋचाओं,
प्रेरणादायक उद्धरणों 
उपदेशों के सार में
जहाँ भी शांति 
का उल्लेख था
लगा दिया गया
'बुकमार्क'
ताकि शांति की महत्ता की
अमृत सूक्तियाँ
आत्मसात कर सके पीढ़ियाँ।

किंतु,
वीर,पराक्रमी और 
शौर्यवान देवतुल्य 
विजेताओं का महिमामंडन 
हिंसा-प्रतिहिंसा की कहानियाँ
प्रेम और शांति से ज्यादा आप्लावित हुई।
दुनियाभर के महानायकों के
ओजस्वी विचारों में
सम्मोहक कल्पनाओं में
'शांति' का अनुवाद
अपनी भाषा और 
अपने शब्दों में परिभाषित
करने का प्रयास, 
कर्म में स्थान न देकर
दैवीय और पूजनीय कहकर
यथार्थ जीवन से अदृश्य कर दिया गया।

अलौकिक रूप से विद्यमान
प्रकृति के सार तत्वों की तरह
शांति शब्द
सत्ताधीशों के समृद्ध शब्दकोश में
'हाइलाइटर' की तरह है
जिसका प्रयोग समय-समय पर
बौद्धिक समीकरणों में
उत्प्रेरक की तरह 
किया जाता है अब।

©श्वेता सिन्हा
१२ जुलाई २०२०

गुरुवार, 9 जुलाई 2020

बुद्धिजीवी


चित्र:मनस्वी

मृदुल मुस्कान और
विद्रूप अट्टहास का
अर्थ और फ़र्क़ जानते हैं
किंतु 
जिह्वा को टेढ़ाकर
शब्दों को उबलने के
तापमान पर रखना
जरूरी है।
हृदय की वाहिनियों में
बहते उदारता और प्रेम
की तरंगों को
तनी हुई भृकुटियों  
और क्रोध से 
सिकुड़ी मांसपेशियों ने
सोख लिया हैं।

ठहाके लगाना 
क्षुद्रता है और
गंभीरता;
वैचारिक गहनता का मीटर,
वे जागरूक
बुद्धिजीवी हैं
उनमें योग्यता है कि
वे हो जाये उदाहरण,
प्रणेता और अनुकरणीय
क्योंकि वे अपने दृष्टिकोण
की परिभाषाओं के
जटिल एवं तर्कपूर्ण
चरित्र में उलझाकर 
शाब्दिक आवरण से
मनोभावों को 
कुशलता से ढँकने का
हुनर जानते हैं।

विवश हैं ...
चाहकर भी
गा नहीं सकते प्रेम गीत,
अपने द्वारा रचे गये
 आभा-मंडल के
 वलय से बाहर निकलने पर
निस्तेज हो जाने से
भयभीत भी शायद...।

#श्वेता सिन्हा
९जुलाई २०२०

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