Wednesday, 9 December 2020

लय मन के स्फुरण की

पकड़ती हूँ कसकर 
उम्र की उंगलियों में
और फेंक देती हूँ 
गहरे समंदर में 
ज़िंदगी के 
जाल एक खाली 
इच्छाओं से बुनी..
तलाश में
कुछ खुशियों की।

भारी हुई-सी जाल 
 निकालती हूँ जब 
उत्सुकतावश,
आह्लाद से भर  
अक़्सर जाने क्योंकर
फिसल जाती हैं 
सारी खुशियाँ।
और .. रह जाती हैं
अटकी हथेलियों में  
दुःख में डूबी 
सच्चाईयों की
चंद किलसती मछलियाँ।

स्मृतियाँ तड़पती आँखों, 
व फूलती साँसों की 
छप-सी जाती हैं
मासूम हृदय पर।
यातना के धीपाये हुए 
सलाखों के
गहरे उदास निशां में
ठहर जाती है लय
मन के स्फुरण की।

#श्वेता सिन्हा


15 comments:

  1. बहुत ख़ूब ..सुंदर अभिव्यक्ति ..।

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  2. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 11-12-2020) को "दहलीज़ से काई नहीं जाने वाली" (चर्चा अंक- 3912) पर होगी। आप भी सादर आमंत्रित है।
    धन्यवाद.

    "मीना भारद्वाज"

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  3. क्या खूब लिखा है आपने इन चंद पंक्तियों में। ।।।।

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  4. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज गुरुवार 10 दिसंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  5. भारी हुई-सी जाल
    निकालती हूँ जब
    उत्सुकतावश,
    आह्लाद से भर
    अक़्सर जाने क्योंकर
    फिसल जाती हैं
    सारी खुशियाँ।
    और .. रह जाती हैं
    अटकी हथेलियों में
    दुःख में डूबी
    सच्चाईयों की
    चंद किलसती मछलियाँ।
    खुशियां जब स्मृति पटल से भी बहुत दूर कहीं गुम सी हो जाती है तब भावनाओं के इस समुन्दर में कितनी गहराई तक जाल फेंकने पर भी यादों में किलसती मछलियाँ ही हाथ आती हैं....
    अद्भुत एवं लाजवाब सृजन।

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  6. पकड़ती हूँ कसकर
    उम्र की उंगलियों में
    और फेंक देती हूँ
    गहरे समंदर में
    ज़िंदगी के
    जाल एक खाली
    इच्छाओं से बुनी..
    तलाश में
    कुछ खुशियों की।

    बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति ...
    हृदयस्पर्शी....

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  7. बेहतरीन रचना।

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  8. अक़्सर जाने क्योंकर
    फिसल जाती हैं
    सारी खुशियाँ।
    बहुत बहुत सराहनीय

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  9. बहुत सुंदर

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  10. बहुत सुंदर सृजन श्वेता आपका! मन की अथाह गहराईयों से जैसे कुछ प्रतिध्वनित हो रहा हो,बस नैराश्य की तरफ भाव कुछ मन को विचलित कर गये।
    सदा खुश रहें सपरिवार।

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आपकी लिखी प्रतिक्रियाएँ मेरी लेखनी की ऊर्जा है।

शुक्रिया।

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