Thursday, 9 July 2020

बुद्धिजीवी


चित्र:मनस्वी

मृदुल मुस्कान और
विद्रूप अट्टहास का
अर्थ और फ़र्क़ जानते हैं
किंतु 
जिह्वा को टेढ़ाकर
शब्दों को उबलने के
तापमान पर रखना
जरूरी है।
हृदय की वाहिनियों में
बहते उदारता और प्रेम
की तरंगों को
तनी हुई भृकुटियों  
और क्रोध से 
सिकुड़ी मांसपेशियों ने
सोख लिया हैं।

ठहाके लगाना 
क्षुद्रता है और
गंभीरता;
वैचारिक गहनता का मीटर,
वे जागरूक
बुद्धिजीवी हैं
उनमें योग्यता है कि
वे हो जाये उदाहरण,
प्रणेता और अनुकरणीय
क्योंकि वे अपने दृष्टिकोण
की परिभाषाओं के
जटिल एवं तर्कपूर्ण
चरित्र में उलझाकर 
शाब्दिक आवरण से
मनोभावों को 
कुशलता से ढँकने का
हुनर जानते हैं।

विवश हैं ...
चाहकर भी
गा नहीं सकते प्रेम गीत,
अपने द्वारा रचे गये
 आभा-मंडल के
 वलय से बाहर निकलने पर
निस्तेज हो जाने से
भयभीत भी शायद...।

#श्वेता सिन्हा
९जुलाई २०२०

23 comments:

  1. व्वाहहह...
    ठहाके लगाना
    क्षुद्रता है और
    गंभीरता;
    वैचारिक गहनता का मीटर,
    वे जागरूक
    बुद्धिजीवी हैं!
    उनमें योग्यता है कि
    वे हो जाये उदाहरण,
    बेहतरीन..

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    1. बहुत बहुत आभारी हूँ दी।
      आपका स्नेहाशीष अमूल्य है।
      सादर।

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  2. Replies
    1. बहुत आभारी हूँ सर।
      आपका आशीष मिला।
      सादर।

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  3. जी नमस्ते ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (११-०७-२०२०) को 'बुद्धिजीवी' (चर्चा अंक- ३५६९) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    --
    अनीता सैनी

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    1. बहुत आभारी हूँ अनु।
      सस्नेह शुक्रिया।

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  4. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शुक्रवार 10 जुलाई 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    Replies
    1. बहुत आभारी हूँ दी।
      आपका स्नेह है।
      सादर।

      Delete
  5. Replies
    1. आभारी हूँ सर।
      सादर।

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  6. बेहतरीन रचना श्वेता जी

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    Replies
    1. आभारी हूँ अनुराधा जी।

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  7. सुंदर प्रस्तुति। कई बार लोग अपनी ही इमेज में कैद होकर रह जाते हैं और चाहकर भी उससे बाहर नहीं आ पाते वहीं कई बार उन व्यक्तियों के प्रशंसक भी उन्हें इस इमेज में कैद करना चाहते और उन्हें बाहर आने नहीं देते। आपने इस विवशता को बाखूबी दर्शाया है।

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    1. रचना का मर्म स्पष्ट करने के लिए बहुत बहुत आभार आपका।
      शुक्रिया।
      सादर।

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  8. जिह्वा को टेढ़ाकर
    शब्दों को उबलने के
    तापमान पर रखना
    जरूरी है।

    वाह!!!

    वे जागरूक
    बुद्धिजीवी हैं!
    उनमें योग्यता है कि
    वे हो जाये उदाहरण,
    प्रणेता और अनुकरणीय
    क्योंकि वे अपने दृष्टिकोण
    की परिभाषाओं के
    जटिल एवं तर्कपूर्ण
    चरित्र में उलझाकर
    शाब्दिक आवरण से
    मनोभावों को
    कुशलता से ढँकने का
    हुनर जानते हैं।

    कमाल का सृजन...
    निशब्द हूँ ऐसे बुद्धिजीवियों के हाव भाव से मनमस्तिष्क की अनुभूति को आश्चर्यजनक शब्द देना कोई आपसे सीखे...
    वाह वाह...
    बहुत ही लाजवाब।

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  9. ठहाके लगाना
    क्षुद्रता है और
    गंभीरता;
    वैचारिक गहनता का मीटर,
    वे जागरूक
    बुद्धिजीवी हैं!
    बहुत खूब,श्वेता जी सादर नमन आपको

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  10. विवश हैं ...
    चाहकर भी
    गा नहीं सकते प्रेम गीत,
    सुन्दर सृजन

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  11. अति सुन्दर रचना

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  12. अत्यन्त सुन्दर सृजन ।

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  13. गहन विचारों का गहन सृजन।
    अपने बनाए जाल में घिरा रहता है व्यक्ति मकड़ी की तरह।
    आत्म वंचना में फसा।
    अप्रतिम सृजन।

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  14. बहुत खूब प्रिय श्वेता | कथित बुद्धिजीवियों के ओढ़े हुए छद्म आचरण को खूब आइना दिखाती प्रभावी रचना | अपने नैसर्गिक भावों का दमन कर - गाम्भीर्य का आवरण धारणकर वे कौन सी प्रसिद्धि चाहते हैं समझ नहीं आता | शायद आज बौद्धिक समाज प्रेमगीतों को निरर्थक समझ बौद्धिकता को ज्यादा महत्व देता है जिसके लिए किसी के सम्मान को ठेस भी पहुंचा दे उसे ग्लानी नहीं होती | सराहनीय सृजन जो मंथन को प्रेरित करता है |

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आपकी लिखी प्रतिक्रियाएँ मेरी लेखनी की ऊर्जा है।

शुक्रिया।

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