अबके फागुन
टेसू नहीं खिले
बेरंग, उदास जंगलों
में पत्तों के बिछावन
संगीनों की नोंक से रक्तरंजित
मासूमों के दर्द सहला रहे हैं...।
पतझड़ में टूटे
ज़िंदगी की शाखाओं से
वसंत आने के बाद
नये पत्ते फिर से मुस्काऍंगे
पर सैनिकों की कराहों
से बेचैन, डरी, अन्यमनस्क
बारूद की गंध से छटपटाती
तितलियों,फूलों, गौरेया के
टेसू नहीं खिले
बेरंग, उदास जंगलों
में पत्तों के बिछावन
संगीनों की नोंक से रक्तरंजित
मासूमों के दर्द सहला रहे हैं...।
पतझड़ में टूटे
ज़िंदगी की शाखाओं से
वसंत आने के बाद
नये पत्ते फिर से मुस्काऍंगे
पर सैनिकों की कराहों
से बेचैन, डरी, अन्यमनस्क
बारूद की गंध से छटपटाती
तितलियों,फूलों, गौरेया के
हृदय में वसंत रंग नहीं भर पाते हैं...
हवाओं में बढ़ती नफरत की
मात्राओं को सोखने में असमर्थ
घबराई चिड़िया नहीं जानती
युद्ध किसलिए है...
शत्रु और मित्र की परिभाषाओं से अनभिज्ञ,
सही-गलत की सीमाओं से परे,
मृत सैनिकों की ऑंखों से
कुछ सपने चुनकर
उनके घर-आंगन में बो रही हैं
ताकि युद्ध खत्म होने के बाद
बंजर हुई धरती की दुर्दशा पर
रोते चातक की ऑंसुओं की नमी से
जब फूटेंगे
कुछ रंग और ख़ुशबू से भरे
हरे-भरे पेड़
उनकी डालियों में वो
फुदक-फुदक कर गा सकेगी
फिर से प्रेम और करुणा से भरी
हवाओं में बढ़ती नफरत की
मात्राओं को सोखने में असमर्थ
घबराई चिड़िया नहीं जानती
युद्ध किसलिए है...
शत्रु और मित्र की परिभाषाओं से अनभिज्ञ,
सही-गलत की सीमाओं से परे,
मृत सैनिकों की ऑंखों से
कुछ सपने चुनकर
उनके घर-आंगन में बो रही हैं
ताकि युद्ध खत्म होने के बाद
बंजर हुई धरती की दुर्दशा पर
रोते चातक की ऑंसुओं की नमी से
जब फूटेंगे
कुछ रंग और ख़ुशबू से भरे
हरे-भरे पेड़
उनकी डालियों में वो
फुदक-फुदक कर गा सकेगी
फिर से प्रेम और करुणा से भरी
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-श्वेता
३१ मार्च२०२६
३१ मार्च२०२६
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