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Saturday, 1 April 2017

थका हुआ दर्द

दर्द थका रोकर अब बचा कोई एहसास नही
पहचाने चेहरे बहुत जिसकी चाहत वो पास नही

पलभर के सुकूं को उम्रभर का मुसाफिर बना
जिंदगी में कहीं खुशियों का कोई आवास नहीं

बादलों की सैर कर लौट आना है वापस फिर
टहनी पर ही रहना घर परिंदों का आकास नहीं

दो जून की रोटी भी मयस्सर मुश्किल से हो जिसे
उसके जीवन में त्योहार का कोई उल्लास नहीं

टूट जाता है आसानी से धागा दिल के नेह का
समझो वहाँ मतलब था प्यार का विश्वास नहीं

   #श्वेता🍁




मौन आहट

मौन आहट
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बदलते मौसम की सुगबुगाहट है,
तपती किरणों की चिलचिलाहट है।

झुलसने लगे बाग के फूल सारे अब,
पेड़ों को भी अब  छाँव की चाहत है।

दिन चढ़ते ही चुंधियाने लगती है आँखें,
गरम थपेड़ो में तन में कसमसाहट है।

अब सूखने लगे है नीर जलाशयों में,
खगवृंदों में जल के लिए अकुलाहट है।

क्या बच्चे,क्या बूढ़े हर उम्र को चाहिए ,
अपने तन मन के लिए थोड़ी तरावट है।

तपते दिन उमस भरी रातों से व्याकुल,
प्रकृति भी स्तब्ध देख रही बदलाहट है।

मौसम शुरूआत में ही तपती धरती सारी,
पर्यावरण से खेलने से सजा की बुलाहट है।

हाथ में अपने है संतुलित करना पर्यावरण को,
वरना सुनते रहो जो विनाश की मौन आहट है।

                                                  #श्वेता🍁


तेरी सुगंध

जबसे आये हो ज़िदगी के चमन में,
हृदय तेरी सुगंध से सुवासित है।
नहीं मुरझाता कभी भी गुलाब प्रेम का,
खिली मुस्कान लब पे आच्छादित है।
कोई काँटा चुभ भी जाए अगर दर्द का,
तुमसे हरपल में खुशी समाहित है।
मेरे जीवन की बहारें कौन कम करे जब,
तेरे साथ से मौसम परिभाषित  है।
                                             #श्वेता🍁