Friday, 7 April 2017

व्यथा एक मन की

व्यथा एक मन की
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एक कमरा छोटा सा
एक बेड,उस पर
बिछे रंगीन चादर
आरामदायक कुशन
जिसपर काढ़े गये
गुलाब के ढेर सारे फूल
दो लकड़ी के
खूबसूरत अलमीरे
एक शीशा उस पर
बेतरतीब से बिखरे
कुछ प्रसाधन
कोने के छोटे मेज पर
सुंदर काँच के गुलदान
में रखे रजनीगंधा के फूल
और झरोखे में लटके
सरसराते रेशमी परदे
इस खूबसूरत सजे
निर्जीव कमरे की एक
सजीव सजावट हूँ मैं
किसी शो पीस की तरह
जिसकी इच्छा अनिच्छा
का मतलब नहीं शायद
तभी तो हर कोई
अपने मुताबिक सजा देता
अपने ख्वाहिशों के दीवार पर।

                #श्वेता🍁       

ज़िदगी

बहाना ढ़ूँढ़ लो तुम हँसने और हँसाने का
मुट्ठीभर साँसों को क्यों गम में गँवाने का

अगर मुमकिन नहीं आसमां में उड़ पाना
हौसला रखो फ़लक ही जमीं पर लाने का

हर फसल ख्वाब की तैयार हो जरूरी नहीं
बोना न भूलो नये ख्वाब जरुर सच होने का

इस ज़िदगी के कारोबार को समझना मुश्किल
एक आँख में पाने की खुशी दूजे में रंज खोने का

टूटकर चकनाचूर होता दिल किसी बहाने से
न बनाओ अपनी खुशी काँच के खिलौने का

      #श्वेता🍁

Tuesday, 4 April 2017

तहरीरैं बेजुबान

दिन आजकल धूप से परेशान मिलती है,
साँवली शाम ऊँघती बहुत हैरान मिलती है।

रात के दामन पर सलवटें कम ही पड़ती है ,
टोहती चाँदनी से अजनबी पहचान मिलती है।

स्याह आसमां पर सितारे नज़्म बुनते है जब,
चाँद की वादियों में तहरीरें बेजुबान मिलती है।

दिल भटकता है जिन ख्वाहिशों के जंगल  में,
ठूँठ झाड़ियों में लटकी हसरतें वीरान मिलती है।

अधजले चाँद के टुकड़े में लिपटे अनमने बादल,
जलती बेचैनियों से रात भी शमशान मिलती है।

           #श्वेता🍁

Monday, 3 April 2017

सूरज ताका धीरे से

Gud morning🍁
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रात की काली चुनर उठाकर
सूरज ताका धीरे से
अलसाये तन बोझिल पलकें
नींद टूट रही धीरे से
थोड़ा सा सो जाऊँ और पर
दिन चढ़ आया धीरे से
कितनी जल्दी सुबह हो जाती
रात क्यूँ होती है धीरे से
खिड़की से झाँक गौरेया गाये
चूँ चूँ चीं चीं धीरे से
गुलाब,बेली की सुंगध से महकी
हवा चली है धीरे से
किरणों के छूते जगने लगी धरा
प्रकृति कहे ये धीरे से
नियत समय पर कर्म करो तुम,
सूरज सिखलाये धीरे से।
 
                          #श्वेता🍁




Saturday, 1 April 2017

थका हुआ दर्द

दर्द थका रोकर अब बचा कोई एहसास नही
पहचाने चेहरे बहुत जिसकी चाहत वो पास नही

पलभर के सुकूं को उम्रभर का मुसाफिर बना
जिंदगी में कहीं खुशियों का कोई आवास नहीं

बादलों की सैर कर लौट आना है वापस फिर
टहनी पर ही रहना घर परिंदों का आकास नहीं

दो जून की रोटी भी मयस्सर मुश्किल से हो जिसे
उसके जीवन में त्योहार का कोई उल्लास नहीं

टूट जाता है आसानी से धागा दिल के नेह का
समझो वहाँ मतलब था प्यार का विश्वास नहीं

   #श्वेता🍁




मौन आहट

मौन आहट
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बदलते मौसम की सुगबुगाहट है,
तपती किरणों की चिलचिलाहट है।

झुलसने लगे बाग के फूल सारे अब,
पेड़ों को भी अब  छाँव की चाहत है।

दिन चढ़ते ही चुंधियाने लगती है आँखें,
गरम थपेड़ो में तन में कसमसाहट है।

अब सूखने लगे है नीर जलाशयों में,
खगवृंदों में जल के लिए अकुलाहट है।

क्या बच्चे,क्या बूढ़े हर उम्र को चाहिए ,
अपने तन मन के लिए थोड़ी तरावट है।

तपते दिन उमस भरी रातों से व्याकुल,
प्रकृति भी स्तब्ध देख रही बदलाहट है।

मौसम शुरूआत में ही तपती धरती सारी,
पर्यावरण से खेलने से सजा की बुलाहट है।

हाथ में अपने है संतुलित करना पर्यावरण को,
वरना सुनते रहो जो विनाश की मौन आहट है।

                                                  #श्वेता🍁


तेरी सुगंध

जबसे आये हो ज़िदगी के चमन में,
हृदय तेरी सुगंध से सुवासित है।
नहीं मुरझाता कभी भी गुलाब प्रेम का,
खिली मुस्कान लब पे आच्छादित है।
कोई काँटा चुभ भी जाए अगर दर्द का,
तुमसे हरपल में खुशी समाहित है।
मेरे जीवन की बहारें कौन कम करे जब,
तेरे साथ से मौसम परिभाषित  है।
                                             #श्वेता🍁

सुरमई अंजन लगा

सुरमई अंजन लगा निकली निशा। चाँदी की पाजेब से छनकी दिशा।। सेज तारों की सजाकर  चाँद बैठा पाश में, सोमघट ताके नयन भी निसृत सुधा...