गुरुवार, 10 फ़रवरी 2022

एकमात्र विकल्प


रश्मि पुंज निस्तेज है
 मुखौटों का तेज है
 सुन सको तो सुनो
 चेहरा पढ़ने में असमर्थ
 आँखों का मूक आर्तनाद।


झुलस रही है तिथियाँ
श्रद्धांजलि  रीतियाँ
भीड़ की आड़ में
समय की लकीरों पर
जूतों के निशान है।


विलाप की विवेचना
शव होती संवेदना
अस्थिपंजर से चिपकी
अस्थियों का मौन
साँसों पर प्रश्न चिह्न है।


धूल-धूसरित,मलबे 
छितराये हुए अवशेष 
विघटन की प्रक्रिया में
हर खंडहर हड़प्पा नहीं 
जीवित मनुष्यों का उत्खनन है।

अफ़रा तफ़री उत्सवी
मृत्यु शोक मज़हबी 
निरपेक्ष राष्ट्र की
प्राणरक्षा के लिए
संप्रदायों का आत्महत्या करना 
एकमात्र विकल्प है।


-श्वेता सिन्हा
१०फरवरी२०२२


 

23 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (११ -०२ -२०२२ ) को
    'मन है बहुत उदास'(चर्चा अंक-४३३७)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  2. नैराश्य के घोर तिमिर में क्रंदन-सा अहसास! अतिरंजित अवसाद भाव!

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  3. अफ़रा तफ़री उत्सवी
    मृत्यु शोक मज़हबी
    निरपेक्ष राष्ट्र की
    प्राणरक्षा के लिए
    संप्रदायों का आत्महत्या करना
    एकमात्र विकल्प है।/////
    मरती मानवीय संवेदनाओं की पड़ताल करती सार्थक रचना प्रिय श्वेता हार्दिक शुभकामनाएं।

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  4. बहुत सुंदर और सार्थक अभिव्यक्ति।

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  5. गहरे, मन को झंझोड़ते भाव ...
    कमाल की रचना है ...

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  6. हाहाकारी अभिव्यक्ति! आरियाँ चलाती हुई....

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  7. श्वेता जी,
    कलम की पैनी धार शब्दों की नुकीली कटार
    दो टूक कसैली टेढ़ी बात नश्तर-सी चुभ गई.

    अभिनन्दन.नमस्ते.

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  8. उफ़्फ़,
    देखो ये विकल्प कब तलक स्किप किया जा सकता है इन ज़बरन-बने-बनाये-ज्ञानी महामूर्खों के द्वारा।
    मानवता को अपने स्वार्थ की ख़ातिर तार तार किये जा रहे हैं रोज।
    ये बेबाक सच्ची कविता हुई... वाह।

    नई पोस्ट- CYCLAMEN COUM : ख़ूबसूरती की बला

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  9. "झुलस रही है तिथियाँ
    श्रद्धांजलि रीतियाँ
    भीड़ की आड़ में
    समय की लकीरों पर
    जूतों के निशान है।"

    बेहद खूबसूरत !!

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  10. आपकी लिखी रचना  ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" रविवार 13 फरवरी 2022 को साझा की गयी है....
    पाँच लिंकों का आनन्द पर
    आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  11. रश्मि पुंज निस्तेज है

     मुखौटों का तेज है

    सुन्दर सृजन

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  12. अधिकतर नकारात्मकता अवसाद का आधार
    शुभकामनाओं के संग सस्नेहाशीष

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  13. मानवीय संवेदनाओं का विवेचन करती बहुत सुंदर रचना,स्वेता दी।

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  14. मानवीय संवेदनाएँ आखिर ढूँढती क्यों हो ? सौहार्द की भावना दम तोड़ चुकी है । धर्म मन में ज़हर भर रहा है कहीं भी कुछ बोला तो विरोध के लिए एक फौज खड़ी है । किसी के पक्ष ,विपक्ष में न राह कर बस निर्विकार भाव रखो । आज के समय में मौन सबसे बड़ा हथियार है । बाकी विकल्प जीवन से पलायन है ।

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  15. रचना तुम्हारे मन में उठने वाले उद्वेग को कह रही है । विचारणीय अभिव्यक्ति ।

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  16. धार दार तंज श्वेता !
    संप्रदायों की आत्महत्या, शानदार व्यंजना भावों का गहन आलोड़न ।
    बहुत सुंदर सृजन।

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  17. विलाप की विवेचना
    शव होती संवेदना
    अस्थिपंजर से चिपकी
    अस्थियों का मौन
    साँसों पर प्रश्न चिह्न
    समसामयिकी पर धारदार कटाक्ष
    प्राणरक्षा के लिए
    संप्रदायों का आत्महत्या करना
    सटीक एवन अद्भुत
    लाजवाब सृजन।

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  18. धूल-धूसरित,मलबे
    छितराये हुए अवशेष
    विघटन की प्रक्रिया में
    हर खंडहर हड़प्पा नहीं
    जीवित मनुष्यों का उत्खनन है।.. गूढ़ चिंतना का संप्रेषण । उत्कृष्ट रचना ।

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आपकी लिखी प्रतिक्रियाएँ मेरी लेखनी की ऊर्जा है।
शुक्रिया।

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