Saturday, 19 May 2018

तुम जीवित हो माने कैसे?

चित्र-मनस्वी प्रांजल

लीपे चेहरों की भीड़ में
सच-झूठ पहचाने कैसे?
अनुबंध टूटते विश्वास की
मौन आहट जाने कैसे?

नब्ज संवेदना की टटोले
मोहरे बना कर मासूमियत को,
शह मात की बिसात में खेले
शकुनियों के रुप पहचाने कैसे?

खींचते है प्राण,अजगर बन
निष्प्राण अवचेतन करके
निगलते सशरीर धीरे-धीरे
फनहीन सर्पों को पहचाने कैसे?

सोच नहीं बदलता ज़माना 
कभी नारी के परिप्रेक्ष्य में
बदलते युग के गान में दबी
सिसकियों को पहचाने कैसे?

बैठे हो कान में उंगलियाँ डाले
नहीं सुनते हो चीखों को?
नहीं झकझोरती है संवेदनाएँ?
मृत नहीं तुम जीवित हो माने कैसे?


   --श्वेता सिन्हा


27 comments:

  1. अद्भुत अभिव्यक्ति श्वेता जी,खासकर
    निगलते सशरीर धीरे धीरे
    फनहीन सर्पों को पहचाने कैसे
    और सबसे बड़ा सत्य समकालिक का,
    बदलते युग के गान में दबी सिसकियों को पहचाने कैसे..
    बहेद खूबसूरती से अभिव्यक्त किया है आपने ढेरों शुभकामनाएं

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    1. बेहद आभार आपका सुप्रिया जी।
      आपकी प्रतिक्रिया रचना का मान बढ़ा गयी।
      तहेदिल से शुक्रिया आपका।
      सादर

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  2. वाह
    बेहतरीन
    सादर

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    1. आभार दी:)
      हृदयतल से अति आभार।

      सादर।

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  3. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 20 मई 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. हार्दिक आभार आपका आदरणीय सर।
      बहुत शुक्रिया आपका।

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  4. लीपे चेहरों की भीड़ में
    सच-झूठ पहचाने कैसे?
    अनुबंध टूटते विश्वास की
    मौन आहट जाने कैसे?

    नब्ज संवेदना की टटोले
    मोहरे बना कर मासूमियत को,
    शह मात की बिसात में खेले
    शकुनियों के रुप पहचाने कैसे?
    मन की वेदना, व्यथा, कटुता को व्यक्त करती तीखी पंक्तियाँ ! इस रचना की हर पंक्ति के लिए साधुवाद प्रिय श्वेता। आपकी ये बेमिसाल रचना सुप्त मनों को झंझोड़कर जगा पाए, यही शुभेच्छा !

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    1. प्रिय मीना जी,
      आपकी इतनी उत्साहभरी सराहना ने मन में एक उम्मीद जगायी है शायद किसी एक पाठक के मन की संवेदनाओं को झकझोर सके तो लिखना सार्थक हो जायेगा।
      हृदय तल से अति आभार बहुत सारा।
      आपका स्नेह सदैव एक उमंग जाता है। स्नेह बना रहे:)
      सादर।

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  5. वाह!!श्वेता ..कितना सुंदर लिखती हैं आप ..
    लिपे चेहरों की भीड़ में ,सच झूठ पहचाने कैसे ..। वाह, वाह!!

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  6. खींचते है प्राण,अजगर बन
    निष्प्राण अवचेतन करके
    निगलते सशरीर धीरे-धीरे
    फनहीन सर्पों को पहचाने कैसे?
    यही तो विडम्बना है ऐसे लोगों को पहचाने कैसे
    बहुत ही सुन्दर ,सार्थक रचना
    वाह!!!

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  7. खींचते है प्राण,अजगर बन
    निष्प्राण अवचेतन करके
    निगलते सशरीर धीरे-धीरे
    फनहीन सर्पों को पहचाने कैसे?
    बेहतरीन, खूबसूरत अभिव्यक्ति श्वेता. बधाई

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  8. एक नारी की व्यथा नारी से ज्यादा कोई नही समझ सकता।प्रेम और सम्मान की भूखी नारी की व्यथा को बडे ही मार्मिक ढंग से आपने प्रस्तुत किया है। बधाई।

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  9. रो देता हूँ अक्सर
    उसकी याद में
    उसकी मासूमियत
    उसकी नादानियाँ उसके स्वभाव में थी
    बच्ची थी,बहुत छोटी थी
    बुरा न सोच सकी बुरों के बारे में
    मर रही थी उस हवसी के सामने तो
    उसकी सोच ये रही होगी
    कोई गलती हो गयी होगी
    जिसकी सजा दे रहे ये अंकल.

    उँगलियाँ डाल के कान में
    अब बैठा हूँ अवाक
    असली चीख न सुनी
    मगर सुन लूँ मन की चीख अब....

    बस उस बच्ची की याद फिर से दिला दी आपकी इस रचना ने.

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  10. लाजवाब श्वेता!!
    प्रतिकों के माध्यम से अंतर दहन को उजागर करना कोई आपसे सीखे अतुल्य।

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  11. लीपे चेहरों की भीड़ में
    सच-झूठ पहचाने कैसे?
    अनुबंध टूटते विश्वास की
    मौन आहट जाने कैसे?

    वास्तविकता के ठोस धरातल पे प्रहार करती उम्दा कविता

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  12. आजकल के सामाजिक परिवेश से पीड़ित मन की आवाज़. सुंदर प्रस्तुति .

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  13. स्वेता,सचमुच आज का परिदृश्य देख कर कई बार मन में यह सवाल पैदा होता हैं कि आज जमाना इतना संवेदनाहीन कैसे हो गया हैं? क्यों नारी की चीखें उसे सुनाई नहीं देती? इस बात को बहुत ही खूबसूरती से शब्दों में पिरोया हैं तुमने। बहुत बहुत बधाई।

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  14. बेमिसाल रचना..

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  15. आदरणीया श्वेता दीदी बेहद लाजवाब रचना
    अतुलनीय सुंदर अभिव्यक्ति
    गहरे प्रश्न जो मन को झकझोर गये
    सादर नमन
    शुभ संध्या 🙇

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  16. Nice Lines,Convert your lines in book form with
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  17. जिस दिल में समवेदनाएँ नहीं वो धड़कता कहाँ है ... मृत है वो तो जो मासूम सिसकियाँ ना पहचाने ... गहरी भावपूर्ण रचना ...

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  18. बहुत सुंदर रचना

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  19. गहरी भावपूर्ण रचना ।

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  20. प्रिय श्वेता ---मौन रहकर किसी अन्याय को देखकर अनदेखा करना --दैहिक ना सही वैचारिक रूप से मृतप्राय होने का लक्षण है यानी मौन को अप्रत्यक्ष सहमती माने तो अतिश्योक्ति ना होगी | सच लिखा आपने और बेहद तीखा और सार्थक लिखा | समाज पर ये मौन बड़ा मर्मान्तक होता है एक संवेदनशील व्यक्ति खासकर कवि के लिए | सार्थक रचना के लिए आप सराहना की पात्र हैं | हार्दिक शुभकामनायें साथ में मेरा प्यार |

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  21. वाह ! रिश्तों में अविश्वास बहुत ही पीड़ा दायक होता है ! खूबसूरत प्रस्तुति ! बहुत खूब आदरणीया ।

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  22. बैठे हो कान में उंगलियाँ डाले
    नहीं सुनते हो चीखों को?
    नहीं झकझोरती है संवेदनाएँ?
    मृत नहीं तुम जीवित हो माने कैसे?
    संवेदनाओं के अनुसंधान में आसक्त मन का अनहद आलाप!!!

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आपकी लिखी प्रतिक्रियाएँ मेरी लेखनी की ऊर्जा है।

शुक्रिया।

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