Wednesday, 8 August 2018

अजीर्णता नदियों की



देखते-देखते जलधारा ने
लिया रुप विकराल
लील गयी पग-पग धरती का
जकड़ा काल कराल 

तट की चट्टानों से टकरा
विदीर्ण जीवन पोत हुआ
बिखरा, टूटा, अवसादग्रस्त
क्रंदन से विह्वल स्रोत हुआ

करुण चीत्कार,हाय पुकार
दहती गृहस्थी ,टूटते सपने
आँख पनीली,कोई देखे कैसे?
जलसमाधि में बचे न अपने

नभ ताकती भूखी आँखों से
गिरता हया-शरम का पानी
सिकुड़ी आँतें,सूखे अधर पर
है विप्लव की पड़ी निशानी

राहत शिविर,रिरियाता बेबस
दानों को मुहताज कलपता
लाशों का व्यापार सीखकर
मददगार अपना घर भरता

फ्लैश चमकती,सुर्खियाँ बनती
ख़बर चटपटी,स्वादिष्ट हो छनती
मुआवज़े का झुनझुना थमाकर
योजनायें,जाँच-समितियाँ जनतींं

जी-भर मनमानी कर पानी
लौटा अपनी सीमाओं में
संड़ांध,गंदगी,महामारी की 
सौगात भर गयी राहों में

हाय! अजीर्णता नदियों की
प्रकृति का निर्मम अट्टहास
मानव पर मानव की क्रूरता
नियति का विचित्र परिहास

--श्वेता सिन्हा

17 comments:

  1. सटीक मर्मस्पर्शी यथार्थ काव्य ।
    एक की दुर्दशा पर दुसरा रोटी सेक रहा
    हा!!कहां गई मानवता
    दुर्दांत प्रकृति का ये उपहार
    कहीं मौतका तांडव कहीं खजाना भर रहा।

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  2. बहुत उम्दा रचना
    प्रकृति के साथ किये खिलवाड़ हम पर ही भारी पड़ रहे हैं

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  3. वाह!!श्वेता ,बहुत ही खूबसूरती के साथ भावों को व्यक्त किया है आपनेंं ।मानव पर मानव की क्रूरता
    नियति का विचित्र परिहास ।
    बहुत खूब ।

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  4. मर्मस्पर्शी रचना

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  5. नमस्ते,
    आपकी यह प्रस्तुति BLOG "पाँच लिंकों का आनंद"
    ( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में
    गुरुवार 9 अगस्त 2018 को प्रकाशनार्थ 1119 वें अंक में सम्मिलित की गयी है।

    प्रातः 4 बजे के उपरान्त प्रकाशित अंक अवलोकनार्थ उपलब्ध होगा।
    चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर।
    सधन्यवाद।

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  6. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 9.8.18 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3058 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

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  7. राहत शिविर,रिरियाता बेबस
    दानों को मोहताज़ कलपता
    लाशों का व्यापार सीख कर
    मददगार अपना घर भरता!!!!!!!
    प्रिय श्वेता -- बाढ़ भले ही प्राकृतिक आपदा कही जाती है पर इसके मूल में मूलतः मानव कृत भूले ही हैं | ये गलतियाँ अब आदत बन गयी है |सबसे दुखद है बाद के बाद की स्थिति पर कथित मसीहाओं की अमानवीयता | इसी स्थिति और बाद की भयावहता को आपने बहुत ही सार्थक शब्द दिए जिसे गद्य में आसान पर पद्य में लिखना बहुत ही दुष्कर कार्य है | आपने बखूबी लिखा और बेहतरीन लिखा

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  8. जीवनदायिनी नदी बाढ़ में विकराल रुप धारण कर लेती है और हर साल बाढ़ से अपार जन धन की हानि होती है। बाढ़ ना भी आए तो भी निचले इलाकों में रहने वाले गरीबों की झोपड़ियाँ तो हर साल डूबती हैं। आपने इस विनाशकारी दृश्य का सजीव चित्र खींचा है। ऐसे समय में गरीबों की बेबसी का फायदा उठाते और इसे मुद्दा बनाकर राजनीतिक रोटियाँ सेंकते लोग मानवता को शर्मसार करते हैं। अपनी कविता में आपने बड़े प्रभावशाली शब्दों में इस दृश्य का चित्रण किया है। बेहतरीन।

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  9. बहुत सार्थक लेखन सखी ...बहुत ही ह्रदयस्पर्शी

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  10. देखते-देखते जलधारा ने
    लिया रुप विकराल
    लील गयी पग-पग धरती का
    जकड़ा काल कराल
    उत्तम काव्य... बहुत अच्छा लिखा आपने
    हाय! अजीर्णता नदियों की
    प्रकृति का निर्मम अट्टहास
    मानव पर मानव की क्रूरता
    नियति का विचित्र परिहास
    ... मानव का प्रकृति के प्रति क्रूर व्यवहार ही प्रतिक्रिया स्वरूप वापस मिलता है। नदियों की महत्ता को बख़ूबी निबाहा आपने अपनी रचना से... शुभकामनाएँ आपको इस बेहतरीन कृति के लिए👌👌👌👏👏👏💐💐💐

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  11. अति उत्तम ...

    फ्लैश चमकती,सुर्खियाँ बनती
    ख़बर चटपटी,स्वादिष्ट हो छनती
    मुआवज़े का झुनझुना थमाकर
    योजनाएँ,जाँच-समितियाँ जनती

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  12. वा...व्व...श्वेता, दिल को छूती बहुत ही सुंदर रचना।

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  13. हाय! अजीर्णता नदियों की
    प्रकृति का निर्मम अट्टहास
    मानव पर मानव की क्रूरता
    नियति का विचित्र परिहास.... हम ही अपने पर्यावरण को नष्ट कर रहे हैं | ये मानवीय भूले ही प्रकृति के विकराल रूप का कारण हैं | आपने बहुत सुंदर लिखा श्वेता जी , मार्मिक कविता

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  14. नियति का ये परिहार ख़ुद हमारा ही पोषित किया हुआ है ...
    प्राकृति का जितना नुक़सान हमने हमारी भूख ने किया है उतना तो ख़ुद प्राकृति भी महि करती ...
    नदियों का बाड़ में बदलना ... बरखा का दिशाहीन बरसना जंगल काटना ... या सब हमारा ही दिया हुआ है ...
    अच्छे शब्दों में आपने वर्णित किया है इस विभीषिका को ...

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  15. शानदार रचना श्वेता जी

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  16. वाह, बहुत ही सुंदर और दिल को छू लेने वाली रचना प्रस्तुत की है आपने। इसके लिये धन्यवाद।

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  17. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है. https://rakeshkirachanay.blogspot.com/2018/08/82.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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