Sunday, 18 April 2021

वक़्त के अजायबघर में

वक़्त के अजायबघर में
अतीत और वर्तमान 
प्रदर्शनी में साथ लगाये गये हैं-

ऐसे वक़्त में
जब नब्ज़ ज़िंदगी की
टटोलने पर मिलती नहीं,

साँसें डरी-सहमी
हादसों की तमाशबीन-सी
दर्शक दीर्घा में टिकती नहीं,

ज़िंदगी का हर स्वाद
खारेपन में तबदील होने लगा
मुस्कान होंठो पर दिखती नहीं,

नींद के इंतज़ार में
करवट बदलते सपने 
रात सुकून से कटती नहीं,

पर फिर भी  कभी किसी दिन
 ऐसे वक़्त में...

चौराहे पर खड़ा वक़्त
राह भटका मुसाफ़िर-सा,
रात ज़िंदगी की अंधेरों में
भोर की किरणें टटोल ही लेगा...,

वक़्त के पिंजरे में
बेबस छटपटाते हालात
उड़ान की हसरत में
फड़फड़ाकर पंख खोल ही लेगें...,

मरूस्थली सुरंग के
दूसरी छोर की यात्रा में
हाँफते ऊँटों पर लदा,बोझिल दर्द
मुस्कुराकर बोल ही पड़ेगा...,

उदासियों के कबाड़
शोकगीतों के ढेर पर चढ़कर
ऐ ज़िंदगी! तेरी इक आहट 
उम्मीदों की चिटकनी खोल ही देगी...।

--------////------
#श्वेता सिन्हा
 १७ अप्रैल २०२१


 

25 comments:

  1. वक़्त के अजायबघर में .... अनुपम बिम्ब ... अतीत और वर्तमान की प्रदर्शनी ... देख रहे हैं , लेकिन समझ नहीं रहे लोग .... सब कुछ निराशाजनक होते हुए भी .... वक़्त चौराहे पर खड़ा जैसे चारों दिशाओं में जैसे कुछ प्रयास कर रहा हो कुछ अच्छा और सुकून देने का ...
    निराशा से आशा की ओर ले जाती रचना कहीं न कहीं मन को सुकून दे रही है ...
    बहुत बढ़िया ...

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  2. बहुत अच्छी कविता, बहुत अच्छे भाव, बहुत अच्छी आशाएं-कामनाएं।

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  3. आशा का संचार करती बहुत सुंदर रचना, श्वेता दी।

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  4. आदरणीया मैम,
    बहुत ही सुंदर और मार्मिक रचना आज की परिस्थिति पर जो आज की दुखद परिस्थिति का वर्णन भी करती है और नई आशा भी जगाती है ।
    यह कोरोना अधिक दिनों तक नहीं रहेगा, जल्दी चला जाएगा अगर हम लोग सावधान रहें। इस बार कोरोना की दूसरी लहर लाने में हमारी अनुषाशनहीनता भी कारण है, मुंबई में तो जम कर नियम तोड़े गए हैं । मैं अभी भी कई लोगों को बिना मास्क पहने सुबह की सिर करते देखती हूँ और कभी- कभी मन करता है, उन सब से पूछूँ की अंकल आंटी आपका मास्क कहाँ है। पर हाँ, जो लोग अभी इस महामारी से जूझ रहे हैं, उनकी स्थिति बहुत करुण है,मेरी भी भगवान जी से यही प्रार्थना है की वह इस कोरोना काल को दूर करें और सभी जरूरतमंदों की सहायता करें, जिन लोगों ने अपने प्रियजन खो दिए, उन्हें शोकमुक्त करें।
    अत्यंत आभार इस बहुत सुंदर भावपूर्ण रचना के लिए व आपको प्रणाम ।

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  5. बहुत ख़ूब श्वेता !
    उम्मीद पे दुनिया कायम है !

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  6. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार ( 19-04 -2021 ) को 'वक़्त का कैनवास देखो कौन किसे ढकेल रहा है' (चर्चा अंक 4041) पर भी होगी।आप भी सादर आमंत्रित है।

    चर्चामंच पर आपकी रचना का लिंक विस्तारिक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के उद्देश्य से सम्मिलित किया गया है ताकि साहित्य रसिक पाठकों को अनेक विकल्प मिल सकें तथा साहित्य-सृजन के विभिन्न आयामों से वे सूचित हो सकें।

    यदि हमारे द्वारा किए गए इस प्रयास से आपको कोई आपत्ति है तो कृपया संबंधित प्रस्तुति के अंक में अपनी टिप्पणी के ज़रिये या हमारे ब्लॉग पर प्रदर्शित संपर्क फ़ॉर्म के माध्यम से हमें सूचित कीजिएगा ताकि आपकी रचना का लिंक प्रस्तुति से विलोपित किया जा सके।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

    #रवीन्द्र_सिंह_यादव

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  7. आशा हो जीवन है,सकारात्मकता को प्रासंगिक बनाती सुन्दर कविता ।

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  8. आपकी लिखी कोई रचना सोमवार 19 अप्रैल 2021 को साझा की गई है ,
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  9. बहुत ही सुन्दर सकारात्मक सार्थक रचना सखी🙏🏼🌹 सादर

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  10. उदासियों के कबाड़
    शोकगीतों के ढेर पर चढ़कर
    ऐ ज़िंदगी! तेरी इक आहट
    उम्मीदों की चिटकनी खोल ही देगी...।
    बहुत सुन्दर 👌

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  11. बहुत सुंदर और सार्थक अभिव्यक्ति।

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  12. चौराहे पर खड़ा वक़्त
    राह भटका मुसाफ़िर-सा,
    रात ज़िंदगी की अंधेरों में
    भोर की किरणें टटोल ही लेगा...,

    वक़्त के पिंजरे में
    बेबस छटपटाते हालात,
    उड़ान की हसरत में
    फड़फड़ाकर पंख खोल ही लेगें...,

    बहुत गहरी रचना और गहरे विचार। कविता जहां अपनी बात कहती है वहीं एक सच भी आकर ठहरता है। बहुत बधाई श्वेता जी।

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  13. बहुत सुन्दर रचना।
    विचारों का अच्छा सम्प्रेषण किया है
    आपने इस रचना में।

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  14. ज़िंदगी का हर स्वाद
    खारेपन में तबदील होने लगा
    मुस्कान होंठो पर दिखती नहीं,

    नींद के इंतज़ार में
    करवट बदलते सपने
    रात सुकून से कटती नहीं,

    पर फिर भी कभी किसी दिन
    ऐसे वक़्त में...
    ऐ ज़िंदगी! तेरी इक आहट
    उम्मीदों की चिटकनी खोल ही देगी...।
    शायद खोल ही देगी उम्मीदों की चिटकनी...
    समसामयिक निराशा के साथ दूर कहीं पनपती आशा...
    लाजवाब सृजन।

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  15. बहुत शुक्रिया श्वेता, नकारात्मकता और घुटन भरे इस माहौल में सकारात्मक और आशावादी सोच की इन अमृत बूँदों की बड़ी जरूरत है !!!
    उदासियों के कबाड़
    शोकगीतों के ढेर पर चढ़कर
    ऐ ज़िंदगी! तेरी इक आहट
    उम्मीदों की चिटकनी खोल ही देगी...।
    इसे शेयर कर रही हूँ, आपके ब्लॉग की लिंक के साथ।

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  16. प्रतीकों के माध्यम से गहरी बात बता गईं आप।
    इसमें छायावाद की छाया झलकती है।

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  17. प्रतीकों के माध्यम से गहरी बात बता गईं आप।
    इसमें छायावाद की छाया झलकती है।

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  18. जिंदगी की आहट ही सब पर भारी पड़ेगी।
    बहुत सुंदर रचना।
    बधाई

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  19. उम्मीद है तो सब है...शानदार रचना।

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  20. बहुत ही सुन्दर

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  21. उदासियों के कबाड़
    शोकगीतों के ढेर पर चढ़कर
    ऐ ज़िंदगी! तेरी इक आहट
    उम्मीदों की चिटकनी खोल ही देगी...।
    क्या बात है प्रिय श्वेता!!
    उम्मीदों से भरा सुंदर सृजन! आशंकाओं और भयावहता केकाल में ये पंक्तियाँ जीने का उत्साह जगाती हैं! आशा ने संसार को सदैव सकारात्मक रखा है. हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई इस भावपूर्ण रचना के लिए!

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  22. उम्मीदों की शमा यूँ ही जलती रहे।

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  23. Very well said, Realistic thoughts. great..

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आपकी लिखी प्रतिक्रियाएँ मेरी लेखनी की ऊर्जा है।

शुक्रिया।

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