Friday, 4 May 2018

आत्मबोध


हर शाम सूरज की 
बोझिल फीकी बाहें
स्याह क्षितिज में 
समाने के पहले
छूकर मेरी आँखों को
उदास कर जाती है
गहरे नीले नभ पर
छायी नीरवता
कोंचने लगती है
मन के सारे भावों को,
तब अपनी अनुभूतियों की
चिता पर लेटी
बेचैन,छटपटाती हुई
तुम्हारी स्मृतियों के एक-एक तारे गिनती हूँ
पूछती हूँ अनुत्तरित प्रश्न स्वयं से
क्यूँ मेरी सिसकियों को अनसुना कर
 विवशता का बहाना किये
बस टुकुर-टुकुर ताकते रहे?
तुम्हारे खोखले भावों में गहरे उतरती रही
तुम खेलते रहे निर्लज्जता से 
तुम्हारे छल को सच समझती रही
मैं जीती रही हर स्वप्न
भूल कर अपने अस्तित्व
पर फिर भी
लाख़ कोशिशों के बावजूद
न भूल सकी गंध
तुम्हारे चम्पई एहसास के
तुम्हें सीने से लगाये हर पल जीती रही
छल के जाल में उलझी
मन की यात्रा से थककर
अब तोड़कर कृत्रिम एहसासों के धागे
जलाकर छद्म अनुभूतियों का कफ़न
अपना सम्मान कर
आत्मबोध के आलोक में
जगमगाना चाहती हूँ।

-श्वेता सिन्हा


30 comments:

  1. स्त्रीमन !!! अत्यंत गूढ़ और अथाह ! जितना समर्पण, उतना ही आत्माभिमान ! सिर्फ प्रेम, विश्वास और सम्मान की चाह रखने वाला स्त्रीमन जब किसी पर विश्वास करता है तो उसे पलकों पर बिठाने में भी देर नहीं लगाता लेकिन विश्वास टूट जाने पर.....
    अब तोड़कर कृत्रिम एहसासों के धागे
    जलाकर छद्म अनुभूतियों का कफ़न
    अपना सम्मान कर
    आत्मबोध की ज्योति में
    जगमगाना चाहती हूँ।
    जलते हुआ मन स्वयं अपनी ही आग में तपकर कुंदन हो जाता है !!!

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    1. जी बहुत आभारी हूँ मीना जी,आपके द्वारा रचना के भावों का विस्तार बहुत अच्छा लगा।
      स्नेह बनाये रखे।
      सादर।

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  2. मन की बात लबों तक लाना मुश्किल है
    और उस से भी जादा मुश्किल है उसे समझना
    वो फिर भी निरंतर प्रयत्न करता रहता है
    अपने स्वाभिमान को बचाने की ...स्त्री का मन
    एक अबूझ पहेली...👌👌👌

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    1. बहुत आभारी हूँ प्रिय नीतू,सुंदर प्रतिक्रिया आपकी सदैव मनोबल बढ़ाती है।
      सस्नेह आभार।

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    2. बहुत ही सुंदर और प्रभावशाली रचना, नमन है आपको

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  3. तोड के सारे भ्रम जिंदगी जी लूं तूझे
    हंस कर जीना है शुरू करु अभी से।

    छलावे से निकलता मन अपना आलोक बनने को बेताब, बहुत सुंदर रचना श्वेता।

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    1. वाह्हह.दी...सुंदर लिखा आपने..:)
      बहुत आभारी हूँ दी...हृदयतल से बेहद शुक्रिया।
      सस्नेह बहुत सारा।

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  4. अनूठी कृति... व्व्व्वाह्... कृतिकार के इस लेखनी को नमन
    .
    स्याह क्षितिज में
    समाने के पहले
    छूकर मेरी आँखों को
    उदास कर जाती है
    ... आगाज़ ही इतना ज़बरदस्त था कि बरबस ही मन भावनाओं के इन लहरों में हिचकोले खाने लगा... आपकी रचनाशैली की, यह कृति एक अनुपम उदाहरण है।
    .
    अब तोड़कर कृत्रिम एहसासों के धागे
    जलाकर छद्म अनुभूतियों का कफ़न
    ... क्षमा कीजिएगा, इन पंक्तियों के लिए उचित शब्द के अभाव में, सादर नतमस्तक होता हूँ🙏

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    1. बहुत बहुत आभार आपका निश्छल जी।
      तहेदिल से शुक्रिया बहुत सारा।
      आपकी की विस्तृत सराहनीय प्रतिक्रिया के लिए जितना भी धन्यवाद कह लूँ कम है।
      विनम्र सादर
      आभार 🙏

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  5. वाह!!श्वेता ,अद्भुत !!बहुत ही सुंदर ...लाजवाब रचना शैली ,सुंदर भावों से सजी कृति .

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    1. बहुत बहुत आभार आपका शुभा दी,तहेदिल से शुक्रिया आपका सस्नेह।

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  6. प्रिय श्वेता -- आत्मबोध ही स्वयं से साक्षात्कार कराता है और आत्मसम्मान का पथ प्रशस्त करता है | सभी उलझनों से गुजर स्वयं का एक पथ चुनना एक अनिर्वचनीय ख़ुशी की ओर ले जाता है | हमेशा की तरह सुंदर रचना प्रिय श्वेता |

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    1. प्रिय रेणु दी,
      आप सदैव रचना के भावों को नवीन अर्थ प्रदान करती है। हृदयतल से अति आभारी हूँ आपकी।
      सस्नेह शुक्रिया सदैव।
      सादर।

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  7. गहरे नीले नभ पर
    छायी नीरवता
    कोंचने लगती है
    मन की सारे भावों को,

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    1. अति आभार आपका दी:)
      हृदयतल से शुक्रिया खूब सारा।

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  8. वाहः
    हर पंक्ति उम्दा
    बेहतरीन रचना

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    1. अति आभार आपका लोकेश जी
      तहेदिल से शुक्रिया बहुत सारा।

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  9. ,बहुत ही शानदार बेहतरीन लाजवाब ....
    फिर कहती हूँ श्वेता जी जाने कितने दिलों को पढा है /जिया है आपने...वाह!!!
    हाँ यह आत्मबोध ही तो है जौ इस छल को समझ पायें परन्तुआत्मबोध की ज्योति में कुछ ही जगमगाते हैं कुछ तो स्वयं ही जल जाते हैं.....
    बहुत ही सुन्दर... अद्भुत कृति।

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    1. प्रिय सुधा जी आपकी उत्साहभरी प्रतिक्रिया ने मन प्रफुल्लित कर दिया है।
      आपकी सुंदर प्रतिक्रिया ने और भी लिखने के लिए प्रेरित किया।
      आभार आपका सस्नेह।

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  10. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 06 मई 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. आदरणीय सर,
      हृदयतल से अति आभारी हूँ आपकी।

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  11. Replies
    1. अति आभार आपका सर।

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  12. स्वेता, स्त्री मन की अबूझ पहेली को बहुत ही सुंदर तरीके से व्यक्त किया है आपने।

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    Replies
    1. बहुत-बहुत आभार ज्योति दी।
      तहेदिल से बेहद शुक्रिया सस्नेह।

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  13. मेरा मानना है ये केवल स्त्री मन की ही बात नही है
    धोका किसी को भी मिले वो फिर कहां सही से जी पात है...
    पहले यादे सताती है फिर अपना ही पागलपन नोचने लगता है..जॉन इलिया साहब का शेर है कि

    "बाद भी तेरे जान-ए-जान दिल में रहा अजब समां
    याद रही तेरी यहाँ, फिर तेरी याद भी गई (यानी पागल आदमी को कुछ याद नही रहता )

    अब जो आप सम्मान की इमारत बनाना चाहते उसकी नींव तो यही पागलपन, दीवानगी होगी.

    बहादुरी से लिखी गयी अद्भुत कविता.

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    Replies
    1. रोहिताश जी, आपकी प्रतिक्रिया बहुत सुखद अनुभूति है मेरे लिए। ब्लॉग पर आपका सादर अभिनन्दन है। आपने बेहद सुंदरता से रचना का विश्लेषण किया बहुत आभारी हूँ।
      कृपया आगे भी आते रहे विनम्र निवेदन है।

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  14. बहुत सुंदर

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    Replies
    1. बहुत आभार आपका ओंकार जी।तहेदिल से.शुक्रिया बहुत सारा।

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  15. कोंचने लगती है
    मन के सारे भावों को,
    तब अपनी अनुभूतियों की
    चिता पर लेटी
    बेचैन,छटपटाती हुई
    तुम्हारी स्मृतियों के एक-एक तारे गिनती हूँ...... बढ़िया!!!

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