Tuesday, 11 June 2019

कितने जनम..

रह-रह छलकती ये आँखें है नम।
कसमों की बंदिश है बाँधे क़दम।।

गिनगिन के लम्हों को कैसे जीये,
समझो न तुम बिन तन्हा हैं हम।

सजदे में आयत पढ़े भी तो क्या,
रब में भी दिखते हो तुम ही सनम।

सुनो, ओ हवाओं न थामो दुपट्टा,
धड़कन को होता है उनका भरम।

मालूम हो तो सुकूं आये दिल को,
तुम बिन बिताने है कितने जनम।

ज़िद में तुम्हारी लुटा आये खुशियाँ,
सिसकते है भरकर के दामन में ग़म।

 #श्वेता सिन्हा


16 comments:

  1. वाह उम्दा /बेहतरीन /बेमिसाल।
    सच बहुत ही सुंदर श्वेता।

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  2. वाह क्या बात.... श्वेता एक और शेर लिख दो तो पूरी ग़ज़ल बन जाए

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  3. बेमिसाल...
    सादर.

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  4. इतना बढ़िया लेख पोस्ट करने के लिए धन्यवाद! अच्छा काम करते रहें!। इस अद्भुत लेख के लिए धन्यवाद

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  5. सुनो, ओ हवाओं न थामो दुपट्टा,
    धड़कन को होता है उनका भरम।
    ज़िद में तुम्हारी लुटा आये खुशियाँ,
    सिसकते है भरकर के दामन में ग़म।
    दूर हो जाने की विवशता के साथ मन में छिपे अप्रितम प्रेम और दूर होकर भी पास होने के भ्रम को बड़ी ही नज़ाकत से शब्दों में पिरोया है प्रिय श्वेता तुमने | बेहतरीन सृजन के लिए हार्दिक शुभकामनायें | सस्नेह --

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  6. बेहतरीन रचना श्वेता जी

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  7. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार जून 13, 2019 को साझा की गई है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  8. सुनो, ओ हवाओं न थामो दुपट्टा,
    धड़कन को होता है उनका भरम।
    वाह !!! बहुत खूब श्वेता जी

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  9. वाह!! लाजवाब सृजन!!

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  10. बहुत त सुंदर रचना

    खास तौर से...

    सुनो, ओ हवाओं न थामो दुपट्टा,
    धड़कन को होता है उनका भरम।

    आभार

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  11. वाह !बेहतरीन दी जी
    सादर

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  12. बहुत खूब ...
    अच्छे शेर बुने हैं श्वेता जी ... अलग अंदाज़ बहुत अच्छा लग रहा है आपका ...

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  13. बहुत खूब लिखा है आपने!!!
    शुक्रिया ..इतना उम्दा लिखने के लिए !

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