Tuesday, 10 September 2019

क्यों....?


दामन काँटों से भरना क्यों?
जीने के ख़ातिर मरना क्यों?

रब का डर दिखलाने वालों
ख़ुद के साये से डरना क्यों?

न दर्द,न टीस,न पीव-मवाद
ऐसे जख़्मों का पकना क्यों?

जो मिटा चुकी यादें गलियाँ
उनके तोहफों को रखना क्यों?

यह जग बाजा़र है चमड़ी का
यहाँ मन का सौदा करना क्यों?

सब छोड़ यहीं उड़ जाना है
पिंजरे के मोह में झंखना क्यों?

#श्वेता सिन्हा

18 comments:

  1. उव्वाहहहह...
    बेहतरीन..
    सादर..

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  2. यह जग बाजा़र है चमड़ी का
    यहाँ मन का सौदा करना क्यों? ... और
    सब छोड़ यहीं उड़ जाना है
    पिंजरे के मोह में झखना क्यों?...
    ... दर्शन और लौकिक दुनिया का संगम ... एक अच्छा तुकान्त प्रयोग ...

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (11-09-2019) को    "मजहब की बुनियाद"  (चर्चा अंक- 3455)    पर भी होगी। --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
     --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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  4. बेहतरीन रचना सखी

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  5. सब छोड़ यहीं उड़ जाना है
    पिंजरे के मोह में झंखना क्यों?
    सुन्दर रचना हेतु बधाई ।

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  6. सब छोड़ यहीं उड़ जाना है
    पिंजरे के मोह में झंखना क्यों?
    वाह!!!!
    क्या बात....
    बिन्दास जीने की सीख देती बहुत ही लाजवाब रचना...
    रब का डर दिखलाने वालों
    ख़ुद के साये से डरना क्यों?
    वाह!!!!

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  7. सब छोड़ यहीं उड़ जाना है
    पिंजरे के मोह में झंखना क्यों?
    अगर ये सत्य समझ लें तो सारा झगड़ा ही खत्म।
    सुंदर सीख देती आध्यात्मिक सी रचना सरस सहज प्रवाह लिए अभिनव सृजन प्रिय श्वेता ।

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  8. आध्यात्मिक दर्शन कहूँ या जीवन दर्शन....जीवन जीने का उचित ज्ञान देती बहुमूल्य पाठ पढ़ाती आपकी पंक्तियों को कोटिशः नमन।
    नारायण आपकी पंक्तियों में निहित संदेश सबके मन तक पहुँचाए
    उत्तम रचना आदरणीया दीदी जी सादर नमन

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  9. वाह ...
    सच की अभिव्यक्ति है हर शेर ... मन में उतरता हुआ ...
    दार्शनिक अंदाज़, कुछ कडुवे ... कुछ सोचने को मजबूर करते हुए ...

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  10. वाह!!श्वेता ,अद्भुत!!

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  11. वाह श्वेता ! बड़ा सूफ़ियाना क़लाम है.

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  12. बेहतरीन व लाजवाब भावाभिव्यक्ति... बहुत उम्दा सृजन श्वेता ।

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  14. रब जो साया है हमीं का उससे कैसा डरना.... गजब गजब
    जहाँ कोड़ियां चलन में हो वहाँ अमूल्य चीज नहीं रखी जाती... वाह वाह

    जख्मो की पीड़ा सहन के बाद ही कोई सून हो सकता है... आहाहा

    अति उत्तम...अति उत्तम

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