Sunday, 28 June 2020

सरहद


धरती के 
मानचित्र पर खींची गयी
सूक्ष्म रेखाओं के 
उलझे महीन जाल,
मूक और निर्जीव प्रतीत होती
अदृश्य रूप से उपस्थित  
जटिल भौगोलिक सीमाएं 
अपने जीवित होने का 
भयावह प्रमाण
देती रहती हैं। 

सोचती हूँ अक्सर 
सरहदों की
बंजर,बर्फीली,रेतीली,
उबड़-खाबड़,
निर्जन ज़मीनों पर
जहाँ साँसें कठिनाई से
ली जाती हैं वहाँ कैसे
रोपी जा सकती हैं नफ़रत?

लगता है मानो
सरहदों को लगी
होती है आदम भूख...
या शायद अपनी जीवंतता
बनाये रखने के लिए 
लेती है समय-समय पर बलि
शूरवीरों की...।

पर सच तो यह है कि....
इंसानों की बस्ती के 
बुद्धिमान,स्वार्थी,
महत्वाकांक्षी नुमाइंदे
वर्चस्व की मंडी के
सर्वश्रेष्ठ व्यापारी होने की होड़ में
सरहद के पहरेदारों के
रक्त से क्रूरता का 
इतिहास लिखकर
खींची सरहद लकीरों को ज्यादा
गहरा करके महानता 
का पदक पहनते और
स्वयं को शांति का
पुरोधा बताते है!!

©श्वेता सिन्हा
२९जून २०२०

27 comments:

  1. वर्ितमान परिपेक्ष्य में सटीक सृजन।

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  2. जब से इंसान के साथ पूर्ण विकसित दिमाग़ जुड़ा है ऐसी कितनी ही बातों के उत्तर नहीं मिलते ... हवा पंछी जानवर किसी के लिए कोई सीमा कहाँ है पर इंसान के क्या कहने ... बहुत भावपूर्ण रचना है श्वेता जी ...

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  3. पदकधारियों पर गहरा कटाक्ष।

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  4. वर्तमान समय के उपयुक्त सुन्दर रचना प्रिय श्वेता जी।

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  5. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज सोमवार 29 जून 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  6. लगता है मानो
    सरहदों को लगी
    होती है आदम भूख...
    या शायद अपनी जीवंतता
    बनाये रखने के लिए
    लेती है समय-समय पर बलि
    शूरवीरों की...।

    कभी कभी मन विचलित सा होता हैं ,परमात्मा की धरा को क्यों सरहदों में बाँट दिया इंसानो ने,और छोटे से जमीन के टुकड़े के लिए कितनो की बलि चढ़ाते है। अंतर्मन को झकझोरता मार्मिक सृजन श्वेता जी,सादर नमन

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  7. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (30-6-2020 ) को "नन्ही जन्नत"' (चर्चा अंक 3748) पर भी होगी,आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    ---
    कामिनी सिन्हा

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  8. बहुत बढ़िया रचना
    बधाई हो

    महेन्द्र देवांगन माटी

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  9. पनपते हैं विषाणु
    इंसान के 'सर' में.
    करती हैं पार 'हदों' को
    हरकतें हैवानियत की.
    फिर उगते हैं कैक्टस
    नफरतों की.
    'सरहदों' पर! ...... सार्थक और समसामयिक रचना!

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  10. धरती के
    मानचित्र पर खींची गयी
    सूक्ष्म रेखाओं के
    उलझे महीन जाल,
    मूक और निर्जीव प्रतीत होती
    अदृश्य रूप से उपस्थित
    जटिल भौगोलिक सीमाएं
    अपने जीवित होने का
    भयावह प्रमाण
    देती रहती हैं...हृदयस्पर्शी सृजन आदरणीय दीदी शायद इंसान की मंशा हमेशा बँटवारा ही रहा है.परिणाम समय ने तय किया.गहन चिंतन है आपके सृजन में .
    सादर

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  11. वर्तमान परिपेक्ष्य के हालातों पर सशक्त भावाभिव्यक्ति । बहुत प्रभावी अभिव्यक्ति ।

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  12. हृदय स्पर्शी सृजन,भाव पक्ष सफल झंकझोरता।
    सरहद तो बेजुबान होती है ,मानव के सर्वार्थ, लोलुपता और महत्त्वाकांक्षा ने न जाने कब सरहद के रूप में शोणितबीज रोप दिए।
    यथार्थ पर संवेदनाओं से भरपूर अभिव्यक्ति।

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  13. लगता है मानो
    सरहदों को लगी
    होती है आदम भूख...
    या शायद अपनी जीवंतता
    बनाये रखने के लिए
    लेती है समय-समय पर बलि
    शूरवीरों की...।
    रक्त रंजित सरहदों के मर्मान्तक और भयावह सच की सशक्त अभिव्यक्ति प्रिय श्वेता |

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  14. कुछ सवालों के जबाब नहीं मिलते

    सराहनीय भावाभिव्यक्ति

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  15. वर्चस्व की मंडी के
    सर्वश्रेष्ठ व्यापारी होने की होड़ में
    सरहद के पहरेदारों के
    रक्त से क्रूरता का
    इतिहास लिखकर
    खींची सरहद लकीरों को ज्यादा
    गहरा करके महानता
    का पदक पहनते और
    स्वयं को शांति का
    पुरोधा बताते है!! बहुत ही हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति श्वेता जी

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  16. कटु यथार्थ ! सरहदें आदमी ने बनायी हैं, ये आवश्यक बुराई हैं, एक देश की हद में रहने वालों को सुकून देती हैं यही सरहदें, यदि देश आपस में मिलजुल कर रहें तो अभिशाप नहीं वरदान बन सकती हैं ये

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  17. आदरणीया मैम,
    मैं आज आपसे पहली बार जुड़ रही हूँ।
    आपके ब्लॉग का नाम गूगल पर देखा। आपकी रचनाएँ पढ़ कर मन बहुत आनंदित भी हुआ और सोंचने पर विवश भी।
    मेरी अब तक की आपकी प्रिय रचनायें सैनिक मेरे देश के, सरहद, शोक गीत और क्या विशेष हो तुम।
    यह सभी रचनाएँ युवा को प्रेरित करने वाली और अंतरात्मा को झकझोरने वाली हैं।
    मैं स्वयं एक विद्यार्थी हूँ और कहानियां व कविताएं लिखती हूँ। मैं ने अभी अभी ही एक ब्लॉग खोला है। kavya tarangini.blogspot.com. क्या आप उस पर जाकर मेरी कविताएं पढ़ने का अनुग्रह करेंगी। मैं आभारी रहूँगी। आपसे जुड़ना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। मैं अबसे नियमित रूप से आपके ब्लॉग पर आती रहूंगी। धन्यवाद।

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  18. www.kavyatarangini.blogspot.com

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  19. संवेदनाओं से भरपूर अभिव्यक्ति
    हृदयस्पर्शी सृजन आदरणीय श्वेता जी

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  20. कुछ देशों के ध्रुवीकरण के कारण भारत भी पिस रहा है पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसियों के कारण वसुधेव कुटुंबकम् की भावना को चोट पहुंचती है
    सुन्दर रचना

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  21. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार(०८-०७-२०२०) को 'शब्द-सृजन-२८ 'सरहद /सीमा' (चर्चा अंक-३७५३) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    --
    अनीता सैनी

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  22. बहुत सुंदर और सटीक चित्रण। संवेदना से परिपूर्ण ,भावपूर्ण लेखन।

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  23. सुन्दर प्रस्तुति

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  24. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" सोमवार 06 जुलाई 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  25. सोचती हूँ अक्सर
    सरहदों की
    बंजर,बर्फीली,रेतीली,
    उबड़-खाबड़,
    निर्जन ज़मीनों पर
    जहाँ साँसें कठिनाई से
    ली जाती हैं वहाँ कैसे
    रोपी जा सकती हैं नफ़रत?
    सच में ऐसी जगहों पर आधिपत्य जताने का क्या मकसद।अपनी सीमा सुरक्षित रखकर सौहार्दपूर्ण व्यवहार क्यों नहीं।
    बहुत ही विचारणीय, लाजवाब सृजन।

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  26. आपकी रचनाएं बहुत सुंदर है ,बहुत आनंद मयी है,
    हाल ही में मैंने एक ब्लॉगर ज्वाइन किया है जिसमें मैंने कुछ स्वलिखित कविता पोस्ट की है ,आपसे निवेदन है कि आप उन्हें पढ़े aour मुझे साड़ी दिशा नर्देश दे
    आपका बहुत आभार होगा
    मेरे पोस्ट की लिंक
    https://shrikrishna444.blogspot.com/2020/07/blog-post_14.html

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आपकी लिखी प्रतिक्रियाएँ मेरी लेखनी की ऊर्जा है।

शुक्रिया।

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मैं  नित्य सुनती हूँ कराह वृद्धों और रोगियों की, निरंतर देखती हूँ अनगिनत जलती चिताएँ परंतु नहीं होता  मेरा हृदयपरिवर...