Wednesday, 12 July 2017

न तोड़ो आईना

न तोड़ो आईना यूँ राह का पत्थर बनकर
खनकने दो न हसी प्यार का मंज़र बनकर

चुपचाप सोये है जो रेत के सफीने है
साथ बह जायेगे लहरों के समन्दर बनकर

न समझो धूल हिकारत से हमको देखो न
आँधी आने दो उड़ा देगे बबंडर बनकर

दिल कौन जीत पाया है शमशीर के बल
मैदान मार लो चाहो तो सिकंदर बनकर

क्या कम है किसी से तेरे जीवन के सफर
हलाहल रोज ही पीते तो हो शंकर बनकर

छुपा लूँ खींच के हाथों में लकीरों की तरह
साँसों सा साथ रहे मेेरा मुकद्दर बनकर

    #श्वेता🍁

6 comments:

  1. वाहः बहुत खूब ग़ज़ल

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    1. जी, बहुत आभार शुक्रिया आपका लोकेश जी।

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  2. न तोड़ो आईना यूँ राह का पत्थर बनकर
    खनकने दो न हसी प्यार का मंज़र बनकर
    एक साथ कई भावों को संजोये बहुत ही सुंदर....शब्‍द नहीं सूझ रहे क्‍या लिखूं इस पर।


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    1. जी, आपकी उपस्थिति ही रचना की सराहना है संजय जी।
      बहुत बहुत आभार शुक्रिया आपका।

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  3. दिल कौन जीत पाया है शमशीर के बल
    मैदान मार लो चाहो तो सिकन्दर बनकर
    वाह!!!!
    बहुत ही सुन्दर...

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    1. बहुत बहुत बहुत शुक्रिया आभार आपका सुवा जी।

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