चकोर


सम्मोहित मन
निमग्न ताकता है,
एकटुक झरोखे से
मुंडेर की अलगनी पर 
बेफिक्र लटके
अभ्रख के टुकड़े से
चमकीले चाँद को,
पिघलती चाँदनी 
की बूँदों को पीने को
व्याकुल
हृदय चकोर।
जानता है 
मुमकिन नहीं छू पाना
एक कतरा भी
उंगली के पोर से भी
फिर भी अवश हो
बौराया चकोर
चाँद की बेपरवाही
भूलकर
बूँदभर चाँदनी के लिए
सिसकता है,
बंधा अपनी सीमाओं से
सुरमई रात के
ख्वाब का भरम टूटने तक।

      #श्वेता🍁

Comments

  1. बहुत ही बेहतरीन रचना
    भावनाओं को उकेरती हुई

    ReplyDelete
  2. सुंदर भाव लिए मोहक रचना,चश्वेथा जी।।।।

    ReplyDelete
  3. वाह ! खूबसूरत रचना ! बहुत सुंदर आदरणीया ।

    ReplyDelete
  4. खूबसूरत रचना, बहुत सुंदर....

    ReplyDelete
  5. अद्वितीय अद्भुत भावों का चमत्कार देखना हो तो सीधे आप की कोई रचना पढ़ लेनी चाहिए मन चकोर जैसे चांद को पा जाता है।
    बहुत बहुत सुंदर।
    शुभ दिवस ।

    ReplyDelete
  6. वाह!!!
    लाजवाब रचना...
    चकोर बंधा अपनी सीमाओं से सुरमई
    रात के भरम टूटने तक......
    वाहवाह....

    ReplyDelete
  7. मानसिकता का सुंदर चित्रण.

    ReplyDelete
  8. खूबसूरत और मनमोहक रचना‎ श्वेता जी .

    ReplyDelete
  9. भारतीय वाङग्मय में प्रतिष्ठा के साथ स्थापित है पक्षी चकोर। चन्द्रमा से इसका अगाध प्रेम इससे जुड़ी लोककथाओं में वर्णित है।
    साहित्य में मौजूद चकोर पर रचनाओं की कड़ी में आपकी इस ख़ूबसूरत सम्मोहक रचना ने भी चार चाँद लगा दिए हैं। अभिव्यक्ति में भावों का सैलाब उमड़ पड़ा है। अति सुंदर रचना आपकी श्वेता जी। लिखते रहिये मर्मज्ञ रसज्ञ जनों को साहित्य के नए रंगों से परिचय कराने हेतु। प्रकृति से जुड़े बिषय आपकी लेखनी मधुरता का एहसास लेकर आती है वाचक के समक्ष। बधाई एवं शुभकामनाऐं।


    ReplyDelete
  10. बहुत सुन्दर रचना है आपकी श्वेता जी। बहुत अच्छी लगी।

    ReplyDelete
  11. बहुत सुंदर रचना।

    ReplyDelete
  12. गहरे एहसास भरी नज़्म ...

    ReplyDelete
  13. बहुत ही सुंदर !!!

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

हिंदी

छठ:आस्था का पावन त्योहार

साथ तुम्हारे हूँ