Tuesday, 13 August 2019

देशभक्त.... आज़ादी(१)


आज़ाद देश के,
जिम्मेदार बुद्धिजीवी
बहुत शर्मिंदा हैं,
देश की बदहाल हवा में,
दिन-ब-दिन विषाक्त होता
पानी पीकर भी 
अफ़सोस ज़िंदा हैं।
आज़ादी की वर्षगांठ पर
विश्लेषण का भारी पिटारा लादे
गली-चौराहों,
नुक्कड़ की पान-दुकानों पर,
अरे नहीं भाई! अब ट्रेड बदल गया है न....
कुछ पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी देशभक्त
अलग-अलग खेमों के प्रचारक 
देश की चिंता में दुबलाते 
क़लम की नोंक से
कब्र खोद-खोदकर 
सोशल मीडिया पर
आज़ाद भारत के दुखित,पीड़ित,दलित
विवादित,संक्रमित विषयों का 
मुर्दा इतिहास,जीवित मुर्दों के
वर्तमान और भविष्य की स्थिति का 
मार्मिक अवलोकन करते
समाज,देश और स्त्रियों की दशा,
दुर्दशा पर चिंतित 
दार्शनिक उद्गार व्यक्त करके
भयावह,दयनीय शब्दों के रेखाचित्र की
प्रदर्शनी लगाकर वाहवाही के 
रेज़गारी बटोरकर आहृलादित होते
सोशल मंच पर उपस्थिति के
दायित्वों का टोकरा खाली करते हैं।
आज़ादी से हासिल 
शून्य उपलब्धियों का डेटा 
अपडेट करते
आज़ाद देश में रहने वाले भयभीत 
असहिष्णुओं का मनोवैज्ञानिक
पोस्टमार्टम करते,
सच-झूठ के धागे और उलझाकर
तर्क-कुतर्क का ज्ञान बघारते
ख़ुद ही न्यायाधीश बने 
किसी को भी मुज़रिम ठहरा 
सही-गलत का फैसला 
गर्व से सुनाते है
देश के नाम का शृंगार कर
देश की माटी में विहार कर
इसी से उपजा अन्न खाकर
चैन की बाँसुरी बजाकर
देश के बहादुर रक्षकों की 
छत्रछाया में सुरक्षित,
देश की आज़ादी की हर वर्षगांठ पर
देश को कोसने वाले 
छाती पीटकर रोने वाले
हमारे देश के 
सोशल बुद्धिजीवी ही तो
सच्चे देशभक्त हैं।

#श्वेता सिन्हा

10 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में " मंगलवार 13 अगस्त 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. कड़वी गोली... सुधार के लिए अच्छी है ।

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (14-08-2019) को "पढ़े-लिखे मजबूर" (चर्चा अंक- 3427) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. भारत माता की जय हो

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  5. हम देशभक्त हम 'सोशल' हैं।
    हम बुद्धिजीवी हम 'मोरल'हैं।।
    हमीं कुरान, हम गीता है।
    हम मरियम, हम सीता हैं।।
    हम संविधान, हम कानून हैं।
    हम नेता, हम निर्गुण हैं।
    हमीं अल्लाह और हमी विष्णु।
    हम सेकुलर,हम सहिष्णु।।
    कर कविताई, कर ले क्रंदन!
    मैं ही सारथी, मैं ही स्यन्दन!!

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  6. सटिक विश्लेषण करती सुंदर प्रस्तूति, श्वेता दी।

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  7. सचमुच कुछ करने वालों और सिर्फ बोलने वालों में जो अंतर होता है वो अंतर ही बनता जा रहा है बड़ा सा वर्ग।
    व्यंग और तंज की सुंदर अभिव्यक्ति।

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  8. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन स्वतंत्रता और रक्षा की पावनता के संयोग में छिपा है सन्देश : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  9. सच-झूठ के धागे और उलझाकर
    तर्क-कुतर्क का ज्ञान बघारते
    ख़ुद ही न्यायाधीश बने
    किसी को भी मुज़रिम ठहरा
    सही-गलत का फैसला
    गर्व से सुनाते है
    बहुत सटीक... लाजवाब...
    वाह!!!

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आपकी लिखी प्रतिक्रियाएँ मेरी लेखनी की ऊर्जा है।

शुक्रिया।

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