दिमाग़ निवाले
गिन सकता है,
भात के दानों से
मसल-मसलकर
खर-कंकड़
बीन सकता है,
पर... भूख का
दिल और दिमाग
रोटी होती है
भात की बाट
जोहती आँतों को
ताजा है कि बासी
मुँह में जाते निवाले
स्पेशल हैं
कि राजसी
फ़र्क नहीं पड़ता।
भूख की भयावहता
रोटी की गंध,
भात के दाने,
बेबस चेहरे,
सिसकते बच्चे,
बुझे चूल्हे,
ढनमनाते बर्तन,
निर्धनों के
सिकुड़े पेट की
सिलवटें गिनकर
क़लम की नोंक से,
टी.वी पर
अख़बार में
नेता हो या अभिनेता
टी.वी पर
अख़बार में
नेता हो या अभिनेता
भूख के एहसास को
चित्रित कर
रचनात्मक कृतियों में
बदलकर
वाह-वाही,
तालियाँ और ईनाम
पाकर गदगद
संवेदनशील हृदय
उस भूख को
मिटाने का उद्योग
करने में क्यों स्वयं को
सदैव असमर्थ है पाता ?
किसी की भूख परोसना
भूख मिटाने से
ज्यादा आसान है
शायद...!!
#श्वेता
किसी को भूख परोसने से
ReplyDeleteभूख मिटाना..
ज्यादा आसान है
शायद...!!
सादर..
सच कहा है ... यही तो होता है आज ... भूख परोसी जाती है ... मिटाने वाले कम हैं ...
ReplyDeleteउद्वेलित करते भाव ...
वाह!!श्वेता ,क्या बात है !!
ReplyDeleteकिसी की भूख परोसना ,भूख मिटाने से ज्यादा आसान है शायद ..... । हृदय को छू गई बात आपकी ...
गज़ब लिखा है. सारगर्भित रचना, बधाई.
ReplyDeleteमोहतरमा ! लोगबाग भूख और लाचारी पर कलम चलायेंगे, सोशल मिडिया के वेब-पन्ने को रंगेंगे तभी तो उनकी TRP बढ़ेगी ... भले भूखे की पेट भरे या ना भरे ... कुछ प्रतिशत सक्षम आबादी भी बिना सेल्फ़ी चमकाए केवल अपने इर्द-गिर्द भूख मिटाने की ठान ले तो ... भूख की रचनाओं के गढ़ने के "कच्चे माल" बस यूँ ही .. नदारद हो जाए .. हो भी रहे हैं .. शायद
ReplyDeleteइस संसार का एक मात्र सत्य है भूख। इसी के ईर्द-गिर्द तो सारा घटनाक्रम है। वास्तव में यही है जो धर्म है और शायद इसीलिए आज ये बेची जा रही,खरीदी जा रही,परोसी जा रही बस मिटाई नही जस पा रही। मिटे भी कैसे? इसे मिटाने वाली रोटी की तो नीलामी हो जाती है। जिसने ऊँची बोली लगाई रोटी उसके घर गई। हाँ यदि उसका जूठन भी बच जाए तो किसी के लिए वो भी सागर मंथन से निकला अमृत हो जाता है।
ReplyDeleteआदरणीया दीदी जी बहुत खूब लिखा आपने। सटीक पंक्तियाँ। आपको और आपकी कलम को सादर प्रणाम 🙏 सुप्रभात।
मार्मिक सृजन श्वेता जी ,ये तो आज का सच हैं सभी " शायद " यही कर रहे हैं ,सादर नमन
ReplyDeleteभूख जो-कुछ करवाये कम है।
ReplyDeleteराशन पर एकाधिकार से भूख परोसी जा रही है।
इस वक्त भूख की परवाह करो
उस पेट वाली भूख की जिसकी नाभि रीढ़ के मनको में धंस गयी है। या उस पेट की परवाह करो जिसकी
नाभि को उभारने के लिए साँसों को मशक्कत करनी पड़े।
मानव को मानवीय गुणों को अमल में लाने का वक्त आ चुका है।
बहुत अच्छी रचना।
हमारे यहां हमारी तरफ से राहत कार्य जारी है और आपके यहाँ ??
बहुत सुन्दर लिखा आपने श्वेता जी
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