Saturday, 16 June 2018

पापा


जग सरवर स्नेह की बूँदें
भर अंजुरी कैसे पी पाती
बिन " पापा " पीयूष घट  आप 
सरित लहर में खोती जाती
प्लावित तट पर बिना पात्र के
मैं प्यासी रह जाती!

निडर पंख फैलाकर उड़ती 
नभ के विस्तृत आँगन में
 टाँक आती मैं स्वप्न सुमन को
जीवन के फैले कानन में
आपकी शीतल छाँह बिना
मैं झुलस-झुलस मर जाती!

हरियाली जीवन की मेरे
झर-झर झरते निर्झर आप
तिमिर पंथ में दीप जलाते
सुनती पापा की पदचाप
बिना आपकी उंगली थामे
पथ भ्रांत पथिक बन जाती!

समयचक्र पर आपकी बातें,
स्मृतियाँ विह्वल कर जाती है
काँपती जीवन डोर खींच
प्रत्यंचा मृत्यु चढ़ाती है
संबल,साहस,संघर्ष का ज्ञान
आपकी सीख, मैं कभी भूल न पाती
मैं कभी भूल न पाती


--श्वेता सिन्हा

13 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 17 जून 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. अति आभार दी:)
      तहेदिल से शुक्रिया आपका बहुत सारा।

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  2. पिता के प्रति आपके शब्द दिल में उतर रहे हैं ...
    मौन छाया से पिता सच में विस्तृत आकाश जैसे होते हैं जिसका अहसास सुकून और हिम्मत देता है ....

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  3. पितृदिवस पर सुन्दर अहसासों का सन्देश।

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  4. बस मन भर आया इस कविता को पढ़कर प्रिय श्वेता। मेरा स्नेह।

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  5. वाह!!श्वेता ,बहुत ही सुंंदर भावभरी रचना । दिल भर आया ....

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  6. वाह अद्भुत श्वेता जी ..
    🌺🌹👏👏👏👏👏👏👏👏
    लगा जैसे मेरे मन भावों को अक्षरशः उकेर रही हो
    अल्फाजों में ढाल ढाल कर मोती से रोल रही हो
    भुला बिसरा सब याद आगया सखी तुमको में करूं नमन
    पितृ भाव सरस रच दिया पढ़ पितृ गण भी होंगे मगन !

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  7. बहुत ही सुंदर अप्रतिम सौन्दर्य से भरे अभिभूत करते भाव श्वेता । ज्यों पिता को इस से अच्छी और कौन सी भाव पूर्ण सौगात होगी।
    हृदय के गहरे उद्गार पिता को समर्पित आपकी सुंदर भावपूर्ण पंक्तियों पर मेरे कुछ समर्पित अल्फाज़...

    देकर मुझ को छांव घनेरी
    कहां गये तुम है तरूवर
    अब छांव कहां से पाऊं

    देकर मुझको शीतल नीर
    कहां गये हो नीर सरोवर
    अब अमृत कहां से पाऊं

    देकर मुझको चंद्र सूर्य
    कहां गये हो नीलाकाश
    अब प्राण वात कहां से पाऊं

    देकर मुझको आधार महल
    कहां गये हो धराधर
    अब कदम कहां जमाऊं।
















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  8. अनुपम... अद्वितीय... बेहतरीन...
    हरियाली जीवन की मेरे
    झर-झर झरते निर्झर आप
    तिमिर पंथ में दीप जलाते
    सुनती पापा की पदचाप
    बिना आपकी उंगली थामे
    पथ भ्रांत पथिक बन जाती!...
    वाह क्या ख़ूब लिखा आपने, पिता को समर्पित विलक्षण रचना...👌👌👌👏👏👏

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  9. वाह वाह नायब रचना प्रिय श्वेता ..मानो मन मेरे को पढ़ रही शब्दों में भावों को गढ़ रही ...
    तिमिर पथ मैं दीपक जैसे दप दप से जल जाते
    आपकी उंगली थाम के ही हम कदम कदम चल पाते ...
    हर पंक्ति प्यास लिये पिता नेह की आस लिये ....
    लाजवाब प्रिय श्वेता

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  10. पिता का स्नेह व् उनकी शिक्षाएं अनमोल होती है ... भावपूर्ण कविता , मन द्रवित हो गया

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  11. पितृदिवस पर पिता को समर्पित बहुत ही सुन्दर लाजवाब प्रस्तुति....

    हरियाली जीवन की मेरे
    झर-झर झरते निर्झर आप
    तिमिर पंथ में दीप जलाते
    सुनती पापा की पदचाप
    बिना आपकी उंगली थामे
    पथ भ्रांत पथिक बन जाती!
    वाह!!!!

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  12. बहुत ही खूबसूरत कविता

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