Friday, 17 February 2017

कर्मपथ

खो गया चंदा बुझ गया दीपक
जाग उठा अंबर का आँचल
टूटा मौन खिलखिलायी धरा
पौधै सँवरे बाग है निखरा
धुल गये फूलों के रूख़सार
उठाकर उदास रात का परदा
दिन निकला मुस्काता सा
भँवरे गूँजें कलियाँ झूमी
अमराई में कोयल कूके
पात पात लहराया वन में
भोर हुई अब आँखें खोलो
सूरज के संग ताल मिलाओ
कल कल गाती नदिया जैसी
कर्म पथ पर बढ़ते जाओ
अपने मन के आस किरण को
भर दो बस्ती बाड़ी जन जन में

                                 #श्वेता🍁



1 comment:

  1. आपकी कविता नए दिन की शुरुआत, उम्मीद और प्रकृति की खूबसूरती के बारे में बड़े ही अच्छे तरीके सा बताती है। सुबह का उजाला सिर्फ बाहर नहीं, बल्कि हमारे मन में भी नई ऊर्जा भरता है। सूरज, फूल, नदी और पक्षियों जैसे दृश्य हमें यह समझाते हैं कि हर दिन मेहनत करने और आगे बढ़ने का मौका देता है।

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आपकी लिखी प्रतिक्रियाएँ मेरी लेखनी की ऊर्जा है।
शुक्रिया।

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