Tuesday, 20 October 2026

राम का सत्य


 ​दौर ऐसा आ पहुँचा है कि
अब रावण को रावण कहने में
संकोच होने लगा है।
​उसका दस-शीश अहंकार,
उसकी वासना और उसकी हठ,
सब इतिहास के पन्नों में दर्ज़ हैं...
पर फिर भी,
मर्यादा पुरुषोत्तम, सर्वसमावेशी ,
समदर्शी और लोकनायक 
राम को श्रीराम कहना
'साम्प्रदायिक सोच' होने लगा है।
 
राम का 'त्याग' अब कमज़ोरी है,
रावण का 'अहंकार' सामर्थ्य है ।
मर्यादा और सादगी के दीये बुझे दिखते हैं,
आज राम के सत्य पर 
 रावण का असत्य
हाशिये पर खड़ा होकर हँस रहा है।
राम की सरलता और सादगी के समक्ष
रावण अपनी विराट अनैतिकता के साथ
कद में बड़ा होने लगा है!
​और हम...
सत्य को सिकुड़ते और
अहंकार को छलाँग लगाते देखते हुए,
मूकदर्शक बनने को मजबूर हैं।
​वह असत्य,
जो सजाया गया है
तर्क के चमकीले आवरण में,
जिसे पहनाए गए हैं
सफलता और बुद्धिमत्ता के मुखौटे।
​राम का सत्य...
जो निष्काम था, नंगे पाँव चला था,
जिसने राजपाठ का मोह छोड़
वन की धूल को गले लगाया था—
​आज उस सत्य को
'अव्यवाहरिक' 
कहकर नकार दिया जाता है।
उसके त्याग को 'महानता का ढ़ोंग' कहकर
इतिहास के पन्नों में बंद कर दिया जाता है।
​और रावण
वह अब मात्र एक पात्र नहीं,
एक विचार बन चुका है।
वह हर चौखट पर खड़े होकर
मर्यादा का उपहास उड़ाता है,
और समाज उसके कुकृत्यों का
महिमा मंडन कर 
शीश नवाता है।
​सत्य अब शांत है,
शायद विश्राम में है,
या किसी प्रतीक्षा में...
जबकि असत्य का शोर
आकाश की ऊँचाइयों को नाप रहा है।

सोचती हूॅं 
इतिहास साक्षी है—
रावण का वह विशाल रूप
ढलती शाम की एक लंबी, 
कायर परछाईं भर है—
जो आकार में बड़ी, 
पर पूरी तरह खोखली है।
​राम का सत्य
आज भले ही क्षितिज पर एक मौन, 
छोटे तारे-सा ठिठका हो,
पर आने वाले नए सवेरे का सूर्य
उसी की मौन साधना के गर्भ में पल रहा है।
-------
-श्वेता 


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शुक्रिया।

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