सॉंझ की बाती
सिर्फ एक लौ नहीं,
एक नन्ही-सी उम्मीद है,
जो अंधेरे को चुनौती नहीं देती,
केसरी सॉंझ की चादर में
रेशमी फुलकारी करती है।
माटी की देह में उमगती,
यह बाती पुल है,
गुज़रे हुए लम्हों और ख़ामोशी के बीच।
बीते कल की यादें जिलाती,
और आने वाले कल की रंगोली सजाती ।
सारी बोझिलता ,थकान,
एकाकीपन समर्पित कर
अंधेरे को
सॉंझ की बाती
मौन प्रार्थना में
प्रज्जवलित करती है
भोर के प्रति विश्वास...।
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-श्वेता

सॉंझ की बाती
ReplyDelete सिर्फ एक लौ नहीं,
भोर की मुस्कुराहट
का भान कराती है
साधुवाद
वंदन
बाती प्रज्वलित रहे विश्वास बना रहे | सुंदर |
ReplyDeleteबहुत सुंदर रचना
ReplyDeleteबहुत सुंदर
ReplyDeleteसाँझ की बाती वाक़ई भावों से भर जाती है हर मन को, दिन भर की थकान को दूर करता उसका प्रकाश आगे आने वाले दिन के लिए एक संदेश बन जाता है, सुंदर रचना
ReplyDeleteबहुत अच्छी रचना प्रस्तुत की है आपने श्वेता जी
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