Saturday, 8 August 2026

स्याही में खोया संघर्ष....

झारखंडी बेटियों के लिए 

स्याही में खोया संघर्ष?

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13 दिनों से जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में

गूँज रही थी एक आवाज़...,

ज़मीन से उठी हुई, हक की, अधिकार की।

​हज़ारों लड़कियाँ—

नीतू कुजूर, शालू कुमारी और उनके साथ

कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी अनगिनत बेटियाँ,

 डटी रहीं रात-दिन।

किसी ने नहीं पूछी उनकी जाति,

ना ही टटोला उनका धर्म,

न ही सुनी गई  उनकी पीड़ा,

न ही समझा  उनका विचार।


और , लड़कों के जनसैलाब के बीच

एक भी उॅंगली नहीं उठी,

न ही शब्दों ने मर्यादा लॉंघी,

सब कंधे से कंधा मिलाकर 

अपनी भागीदारी निभा रहे थे

क्योंकि इस आंदोलन का सच —

आत्मसम्मान , पढ़ाई और भविष्य था।


​ 14वें  दिन-

 एक भीड़ में, सजती है एक नई पटकथा,

और विधानसभा के मोड़ पर

उछल जाती हैं स्याही की कुछ बूँदें।

इस स्याह स्याही ने ​बस...

वहीं से बदल दिया पूरा मंज़र,

वहीं से गढ़ लिया जाता है एक नया नैरेटिव।

​अचानक टीवी के कैमरों और सोशल मीडिया के पन्नों पर

सदियों का इतिहास याद दिलाया जाने लगता है,

उछाल दिए जाते हैं अहिल्याबाई से लेकर गोबर और कीचड़ तक के क़िस्से,

बना दी जाती हैं थ्योरियाँ—

"ये वही लोग हैं जो स्त्रियों को दासी समझते हैं!"

"ये वही लोग हैं जो बेटियों को पढ़ते नहीं देख सकते!"

आदि-इत्यादि...

​अजीब मुग़ालता है!

अचानक 13 दिन की तपस्या ओझल हो गई?

जो लड़कियाँ धूप में बैठकर इतिहास लिख रही थीं,

क्या वे पढ़ी-लिखी नहीं थीं?

क्या उनका संघर्ष, संघर्ष नहीं था?

​क्या सशक्तिकरण का एकमात्र 'चेहरा'

अब मीडिया के कैमरों से तय होगा?

क्या बाक़ी हज़ारों लड़कियाँ,

जो अनुशासित रहकर अपने हक के लिए लड़ रही थीं,

अचानक अप्रासंगिक कर दी गईं?

​स्याही फेंकना बहुत ग़लत था,

नहीं करती समर्थन पूरी भीड़

पर उस एक घटना की आड़ में

पूरे आंदोलन की पवित्रता पर कालख पोत देना...

कितना सही है?


सोच रही हूॅं ...

मुझे नहीं समझ राजनीति की,

मैं खोना नहीं चाहती तर्क के ज़ाल फेंकते

वामपंथी,दक्षिणपंथी या विचारधाराओं की आड़ में 

विष वमन करते क़लमधारियों की;

मन में ​सवाल तैर रहे हैं—

क्या पढ़ाई की परिभाषा केवल कुछ नामों तक सीमित है?

या फिर उन हज़ारों बेटियों के पसीने में भी

वही मशाल जल रही है?

जिसे अनदेखा कर

कुछ आँखें आज मुँह मोड़ रही हैं?

लग रहा प्रीमियम विचारों का

चमकदार खोल 

मड़ुआ के दाने-सी

झारखंडी बेटियों का संघर्ष 

निगल ही जायेगा... ।

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-श्वेता 


3 comments:

  1. सचेतक है ये रचना
    समझदार सुरक्षित हो जाएंगे
    वंदन

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  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर रविवार 09 अगस्त 2026 को लिंक की गयी है....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!


    !

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  3. लग रहा प्रीमियम विचारों का
    सार्थक है विचारों का समान्य और प्रीमियम होने की अवधारणा

    ReplyDelete

आपकी लिखी प्रतिक्रियाएँ मेरी लेखनी की ऊर्जा है।
शुक्रिया।

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