Thursday, 20 August 2026

सरगोशियों के स्वर


पुस्तक समीक्षा: — 'सरगोशियों के स्वर'

पुस्तक का नाम: सरगोशियों के स्वर

लेखक: डॉ. सुशील कुमार जोशी

विधा: कविता संग्रह (अतुकांत कविताएँ)

प्रकाशक: न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन (New World Publication)

मूल्य: ₹299 (ISBN: 978-93-6407-167-3)


भूमिका


विज्ञान और साहित्य का संबंध अक्सर अलग-थलग माना जाता है, लेकिन जब एक वैज्ञानिक का संवेदनशील हृदय कविता रचता है, तो विचारों में एक अनूठा संतुलन और स्पष्टता दिखाई देती है। डॉ. सुशील कुमार जोशी द्वारा रचित अतुकांत कविताओं का संग्रह 'सरगोशियों के स्वर' ऐसा ही एक सुंदर प्रयास है। शीर्षक स्वयं में यह संकेत देता है कि ये कविताएँ कोई भारी-भरकम शोर नहीं मचातीं, बल्कि जीवन के सूक्ष्म अनुभवों की धीमी और गहरी 'सरगोशियाँ' (Whispers) हैं।


लेखक का परिचय

"डॉक्टर सुशील कुमार जोशी"  चिट्ठाजगत में 

सबसे ज्यादा चिर-परिचित और सक्रिय ,सजग नाम है। 

उनके द्वारा ब्लॉग में संकलित कविताओं को ब्लॉग में पढ़ना और पुस्तक के रूप में पढ़ना दो बिल्कुल अलग अनुभव है मेरे लिए।

डॉ. सुशील कुमार जोशी मूलतः अल्मोड़ा (उत्तराखंड) के रहने वाले हैं। भौतिक रसायन में पीएचडी प्राप्त डॉ. जोशी सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय में वरिष्ठ प्राध्यापक, संकायाध्यक्ष एवं परीक्षा नियंत्रक जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का निर्वहन कर चुके हैं। अकादमिक शोध पत्रों और शैक्षणिक पुस्तकों ('इंजीनियरिंग केमिस्ट्री', 'क्यों असफल होते हैं बच्चे') के लेखन के साथ-साथ एक ब्लॉगर और समाज सेवी के रूप में उनकी सक्रियता उनके विविध आयामों को दर्शाती है।


विषय-वस्तु और भाव-पक्ष

यह संग्रह आधुनिक जीवन के विविध रंगों और अतुकांत शैली की सहजता को समेटे हुए है।

संग्रह की पहली रचना  "भारत की पचासवीं वर्षगाँठ" और "किसी को कैसे बताऊँ अपना धर्म"  धर्म, राजनीति और बाज़ारीकरण के छल पर तीखा व्यंग्य करती हैं:

"सदियों से मेरी गर्मी / मेरी सर्दी से राजनीति कर रही है"

"पैसा है तो नंगा हो जा, मुनि कहलाएगा / पैसा नहीं है, भिखारी कहलाएगा" 

यह रचना अपना प्रभाव मन-मस्तिष्क पर छोड़ती है और आगे की रचनाओं को पढ़ने के लिए प्रेरित करती है।


दर्शन, आत्म-बोध और कला की समझ दर्शाती

"आदमी और सौर मण्डल" तथा "चित्रकार का चित्र/कवि की कविता" जैसी रचनाओं में वैज्ञानिक चेतना और दार्शनिक गहराई का सुंदर संतुलन है।

"आदमी घूमता है / तारा बन / अपने ही बनाए / सौर मण्डल में"

"कवि की कविता / और चित्रकार का एक चित्र / कभी-कभी यूँ ही बिना बात के / एक पहेली बन जाता है"


कवि दैनिक जीवन के बेहद सूक्ष्म बिंबों से मनुष्य की अंधी तृष्णा और संतोष के अंतर को उघाड़ते हैं। "गौरैया" कविता में पक्षी और मनुष्य के चरित्र की तुलना दृष्टव्य है:

"गौरैया / रोज आती है / एक मुट्ठी चावल से / बस चार दाने ही उठाती है..."

"आदमी / चावल के बोरों की गिनती करते हुए / कभी नहीं थकता है"


सच कहे  तो सर की कविताओं को पुस्तक में पढ़ना ज्यादा 

रूचि कर लगा। हर रचना अपना अलग गहन प्रभाव छोड़ रही है।  संग्रह की कविताएँ दैनिक जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों, सामाजिक रिश्तों के ताने-बाने, और आत्म-मंथन को बेहद सरलता से अभिव्यक्त करती हैं। सर भावुकता के अतिरेक में बहने के बजाय यथार्थ के धरातल पर बात करते हैं।



अधिकतर  कविताएँ अतुकांत  हैं। तुकांतता के बंधन से मुक्त होने के कारण विचार सीधे पाठक के हृदय तक पहुँचते हैं। भाषा अत्यंत सीधी और बोधगम्य है। किसी कठिन आलंकारिक भाषा के बजाय बोलचाल और विचारों की स्पष्टता को प्राथमिकता दी गई है।

​ यद्यपि कविताएँ छंदमुक्त हैं, फिर भी इनमें एक भीतरी लय और पठन-प्रवाह  मौजूद है जो पाठक को बाँधे रखता है।


 कुछ त्रुटि जो मुझे समझ आयी -

अनुक्रम में क्रमांक का अभाव: पृष्ठ संख्या तो दर्ज है, पर कविताओं की क्रम संख्या (S.No.) न होने से कुल रचनाओं का अंदाज़ा लगाना कठिन होता है।

अत्यधिक लंबे शीर्षक: कुछ शीर्षक वाक्य जितने लंबे हैं (जैसे— "आज़ादी के मायने सबके लिये उनके अपने हिसाब से हैं बस हिसाब बहुत ज़रूरी है"), जिससे शीर्षकीय कसावट कम होती है।

​ कई जगह पंक्तियों का विस्तार इतना अधिक है कि वे कविता से अधिक काव्यात्मक गद्य जैसी लगती हैं।


पुस्तक पढ़ने के बाद मुझे लगता है कि 

 'सरगोशियों के स्वर' उन पाठकों के लिए एक विचारोत्तेजक और संग्रहणीय पुस्तक है जो आडंबरहीन, सरल और यथार्थवादी काव्य-रचनाएँ पसंद करते हैं। सुशील सर  का यह प्रयास यह प्रमाणित करता है कि विज्ञान के समीकरणों और प्रशासनिक व्यस्तताओं के बीच भी एक संवेदनशील कवि-हृदय लगातार स्पंदित होता रह सकता है।




यह पुस्तक आमेजन पर उपलब्ध है।

इसका लिंक :

https://amzn.in/d/038trhR6


- श्वेता सिन्हा 


15 comments:

  1. Replies
    1. आभारी हूॅं सर,आपका आशीर्वाद बना रहे।
      सादर।

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  2. अपने फेसबुक पेज पर साझा कर रहा हूं l

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  3. वाह
    पूरन

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    1. जितने लोग किताब को पढ़ रहे हैं उतने अर्थ निकल रहे हैं! सादर साभार
      डॉ पूरन जोशी अल्मोड़ा

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    2. बहुत-बहुत आभारी हूॅं सर।
      सबका अपना दृष्टिकोण है न इसलिए शायद।
      सादर।

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  4. बेहतरीन व्याख्या
    गहन चिंतन
    सादर वंदन

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  5. जावेद जी ने पढ़ा पर यहां टिप्पणी नहीं कर पाए मुझे भेज दिए मै यहां चिपका दे रहा हूं
    सुंदर समीक्षा - सरल, संतुलित, सारगर्भित!
    गंभीरता से 'सरगोशियों के स्वर' सुनने और उसकी भाषा, दृष्टिकोण तथा सामाजिक सरोकारों एवं संवेदनाओं को समझने की कोशिश ने संकलन के पाठकों का काम सहज कर दिया।
    रचनाकार के व्यक्तित्व पर केंद्रित समीक्षक की टिप्पणी कविताओं में सक्रिय विचारों एवं प्रतिबद्धताओं से संबंधित सरलतम जटिलताओं को निश्चित रूप से एक पर्सपेक्टिव प्रदान करती।💐

    जी. जावेद रसूल
    लखनऊ

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    1. जावेद सर जी को तहेदिल से बहुत-बहुत आभार।
      सादर।

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  6. सार्थक और सटीक समीक्षा

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  7. This comment has been removed by the author.

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  8. सर की लेखन शैली अनूठी है उनके कृतित्व और व्यक्तित्व का परिचय देती बारीकी से की गई बहुत सुन्दर और सारगर्भित समीक्षा ।

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  9. कमाल की समीक्षा लिखी प्रिय श्वेता !
    बहुत ही सारगर्भित, संतुलित एवं आत्मीय..
    आपने पुस्तक के भाव और संवेदनाओं को जिस सहजता से शब्द दिए हैं वे बहुत प्रभावी हैं । बधाई आपको एवं आदरणीय जोशी जी को भी "सरगोशियों के स्वर" की सफलता के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं ।

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  10. बहुत अच्छी जानकारी पुस्तक के बारे में,,, विस्तारपूर्वक सटीक प्रस्तुति जोशी जी की पुस्तक के बारे में,,हमारे अल्मोड़ा के कई जाने माने लेखक, साहित्यकारों में जोशी जी भी सम्मिलित हैं .
    सरगोशियो के सफ़र पुस्तक प्रकाशन पर उन्हें हार्दिक शुभकामनाएं और आपका आभार

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आपकी लिखी प्रतिक्रियाएँ मेरी लेखनी की ऊर्जा है।
शुक्रिया।

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