Saturday, 15 April 2017

शाम

सूरज डूबा दरिया में हो गयी स्याह सँवलाई शाम
मौन का घूँघट ओढ़े बैठी, दुल्हन सी शरमाई शाम

थके पथिक पंछी भी वापस लौटे अपने ठिकाने में
बिटिया पूछे बाबा को, झोली में क्या भर लाई शाम

छोड़ पुराने नये ख्वाब अब नयना भरने को आतुर है
पोंछ के काजल ,चाँदनी भरके थोड़ी सी पगलाई शाम

चुप है चंदा चुप है तारे वन के सारे पेड़ भी चुप है
अंधेरे की ओढ़ चदरिया, लगता है पथराई शाम

भर आँचल में जुगनू तारे बाँट आऊँ अंधेरों को मैं
भरूँ उजाला कण कण में,सोच सोच मुस्काई शाम

             #श्वेता🍁

8 comments:

  1. छोड़ पुराने नये ख्वाब अब नयना भरने को आतुर है
    पोंछ के काजल ,चाँदनी भरके थोड़ी सी पगलाई शाम

    सुंदर

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    1. जी बहुत बहुत आभार आपका P.K ji

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  2. चुप है चंदा चुप है तारे वन के सारे पेड़ भी चुप है
    अंधेरे की ओढ़ चदरिया, लगता है पथराई शाम
    वाह! श्वेता बहुत ही उम्दा रचना आपकी सजीव एवं लयबद्ध।
    आप एक अच्छी कवित्री हैं ,लिखते रहिए। शुभकामनायें

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    1. बहुत बहुत आभार शुक्रिया आपकी इतनी सराहना के लिये।आपकी शुभकामनाएँ बहुत जरूरी है ।

      साथ बनाये रखे ।

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    2. बहुत बहुत आभार शुक्रिया आपकी इतनी सराहना के लिये।आपकी शुभकामनाएँ बहुत जरूरी है ।

      साथ बनाये रखे ।

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  3. थके पथिक पंछी भी वापस लौटे अपने ठिकाने में
    बिटिया पूछे बाबा को, झोली में क्या भर लाई शाम

    बहुत खूब कहा है

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    1. बहुत आभार आपका संजय जी।सराहना के लिए शुक्रिया आपका।

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  4. यह कविता पढ़ते ही आँखों के सामने शाम उतर आती है। आपने शाम को इंसान की तरह जीता-जागता बना दिया है, यही इसकी सबसे बड़ी खूबी लगी। आपकी कविता उदासी नहीं फैलाती, बल्कि अंधेरे में भी उजाले की चाह जगाती है।

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आपकी लिखी प्रतिक्रियाएँ मेरी लेखनी की ऊर्जा है।
शुक्रिया।

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