कभी तो नज़र डालिए अपने गिरेबान में
ज़माना ही क्यों रहता बस आपके ध्यान में
ज़माना ही क्यों रहता बस आपके ध्यान में
कुछ ख्वाब रोज गिरते है पलकों से टूटकर
फिर भोर को मिलते है हसरत की दुकान में
फिर भोर को मिलते है हसरत की दुकान में
मरता नहीं कोई किसी से बिछड़े भी तो
यही बात तो खास है हम अदना इंसान में
यही बात तो खास है हम अदना इंसान में
दूरियों से मिटती नहीं गर एहसास सच्चे हो
दूर नज़र से होके रहे कोई दिल के मकान में
दूर नज़र से होके रहे कोई दिल के मकान में
दावा न कीजिए साथ उम्रभर निभाने का
जाने वक्त क्या कह जाये चुपके से कान में
जाने वक्त क्या कह जाये चुपके से कान में

वाहः बहुत सुंदर ग़ज़ल
ReplyDeleteबहुत बहुत आभार शुक्रिया आपका लोकेश जी।
Deleteबहुत बढ़िया गजल ----------
ReplyDeleteजी, बहुत बहुत आभार शुक्रिया आपका रेणु जी।
Deleteदूरियों से मिटती नहीं गर एहसास सच्चे हो
ReplyDeleteदूर नज़र से होके रहे कोई दिल के मकान में
सधी लेखनी उत्तम विचार ,सुन्दर ! आभार। "एकलव्य"
जी, बहुत बहुत शुक्रिया आभार आपका ध्रुव जी।
Deleteप्रतिक्रिया सदैव प्रोत्साहित करती अच्छा लिखने को।
अनेको धन्यवाद ।
बहुत खूब ... गहरे शेर .. कोई नहीं मस्त किसी की खातिर ... क्या बात ..
ReplyDeleteऔर अपने गिरेबान में भी कोई नहीं झांकता ... कमाल की बातें कह दी आपने ...
बहुत बहुत आभार शुक्रिया आपका नासवा जी।आपके सराहनीय शब्दों के लिए हृदय से धन्यवाद।
Deleteअदभुत लेखनी उम्दा लफ़्ज़ों का चयन! प्रशंशनिये रचना
ReplyDeleteसंजय जी,आपने सदा सराहा ही है मेरे लेखन को आपकी शुभकामनाएँ और प्रशंसनीय शब्दों के लिए आपको बहुत बहुत शुक्रिया और हृदय से धन्यवाद।
Deleteवाह
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